**जब साधक नियमित ध्यान साधना करता है, तो अपने अहंकार, इच्छाओं और भय को छोड़ देता है।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

   


   ईश्वर को हम आँखों से नहीं देख सकते, न शरीर से छू सकते हैं। लेकिन जब हम ध्यान में बैठते हैं, तब भीतर एक ऐसी अनुभूति होती है जो शब्दों और इन्द्रियों से परे है । यह वही चाहत है  ईश्वर को पाने की, उससे जुड़ने की । भले ही उसे बाहरी रूप में न छू पाएं, लेकिन अंतरात्मा में उसकी उपस्थिति महसूस होती है। जब साधक नियमित ध्यान करता है, अपने अहंकार, इच्छाओं और भय को छोड़ देता है, और खुद को पूरी तरह उस दिव्य शक्ति के हवाले कर देता है।  तब उसका 'मैं' लुप्त हो जाता है । उसकी हर साँस, हर कर्म अब प्रार्थना बन जाती है। धीरे-धीरे उसका मन इतना शुद्ध हो जाता है कि लोग उसके पास आकर शांति महसूस करने लगते हैं।  क्योंकि अब उसकी आत्मा अहंकार से खाली हो जाती है और  उसमें सिर्फ़ भगवान का भाव रह जाता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से असली भक्ति वही है, जहाँ ईश्वर के प्रति प्रेम हमें इतना गहरा बदल दे कि हमारा अहंकार मिट जाए और जीवन एक साधना बन जाए।

प्रेम यहाँ सिर्फ़ भावनात्मक नहीं बल्कि आध्यात्मिक यात्रा है।

शुरुआत होती है ईश्वर को पाने की ललक और पूर्ण समर्पण, जहाँ भक्त और ईश्वर अलग नहीं रहते।

मान लो किसी ने फूल को छुआ। उसे फूल की नर्मी महसूस हुई। लेकिन वही फूल अगर आत्मा को छू ले, तो इंसान उसमें खो जाता है, उसकी ख़ुशबू में लीन हो जाता है। यही है प्रेम। यानी सच्चा प्रेम ऐसा होता है जिसमें प्रेमी अपनी पहचान खो देता है। जैसे नदी जब सागर में गिरती है तो अपनी अलग पहचान नहीं रखती, वह सागर ही बन जाती है।ठीक वैसे ही इंसान जब ईश्वर से प्रेम करता है, तो उसका 'मैं’ मिट जाता है और वह खुद ईश्वर का अंश अनुभव करने लगता है।

इसीलिए कहा गया है “ईश्वर को बाहर मत खोजो, अपने भीतर खोजो। जब अहंकार हट जाएगा, तब तुम पाओगे कि वही प्रेम, वही भाव तुम्हारे भीतर पहले से मौजूद है।”

  अतः हमें किसी ब्रह्मनिष्ठ सत्गुरु से ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर निरंतर ध्यान साधना, सेवा व सत्संग करते रहना चाहिए। 

**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**

"श्री रमेश जी"

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