सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
समाधि भारतीय संस्कृति और सनातन पुरातन वैदिक धर्म का अभिन्न अंग रही है । भारतीय संस्कृति मात्र बौद्धिक कसरत या मानसिक ऊहापोह का परिणाम नहीं है। सिर्फ गोष्ठियों या चर्चाओं के आधार पर भारतीय संस्कारों, परंपराओं, रीति-रिवाजों या प्रथाओं का निर्माण नहीं हुआ। इन सभी की एकमात्र आधार रही है - हमारे ऋषियों की अंत: भूमि! उनके अंतर जगत की दिव्य अनुभूतियां। ऋषि का अर्थ ही होता है- दृष्टा अर्थात जो देखता है। ऋषियों ने अंतर जगत में वेद मंत्रों का प्रत्यक्ष रूप में साक्षात्कार किया। उसके उपरांत उन्होंने इन मंत्रों को शाब्दिक रूप देकर अपने शिष्य समाज तक प्रसारित किया। इसी अंत: साक्षात्कार द्वारा उन्होंने वेद- उपनिषद आदि आधारभूत आर्ष ग्रंथों का संकलन किया। ब्रह्मांड अथवा सृष्टि तथा मानव जीवन के सभी पक्षों के विषय में भी हमारे ऋषियों को अंतर जगत में प्रत्यक्ष अनुभूति या दर्शन हुआ। इसी के आधार पर लोक कल्याण हेतु अनेकों ग्रंथों और भाष्यों की रचना हुई। परंतु यह भी सत्य है कि समय के साथ साथ शास्त्र ग्रंथों, धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं की प्रासंगिकता खोने लगती है। ऐसे में संत, महापुरुष, सद्गुरु स्वयं प्रकट होकर इनकी उपयोगिता और सार्थकता को सामयिक ज्ञान, विज्ञान तथा विचारधाराओं के अनुसार पुनर्स्थापित करते हैं। गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी ने भी इसी रीति का निर्वाह करते हुए वर्तमान युग में रूढ़ियो, भ्रांतियों और अंधविश्वासों का शास्त्रों के आधार पर मूलोच्छेदन किया है और समाज को धर्म के वास्तविक स्वरूप से जुड़ने की सनातन पुरातन शाश्वत विधि ब्रह्मज्ञान प्रदान की है। वही ब्रह्मज्ञान जिसकी ध्यान साधना के आधार पर ऋषियों -मनीषियों के अंतर जगत में भारतीय संस्कृति का अंकुरण हुआ।
यही नहीं, श्री आशुतोष महाराज जी ने अनेकों बाह्य प्रयासों द्वारा भी सनातन पुरातन वैदिक धर्म की लुप्त होती मान्यताओं और भारतीय संस्कृति के विभिन्न अंगों को आधुनिक जीवन शैली का सजीव अंग बनाया है। जैसे शास्त्र अध्ययन, वेद मंत्रोच्चारण, संस्कृत संभाषण, शास्त्रीय संगीत, कवितावली, पौराणिक कथाओं का वाचन तथा यज्ञ आदि। श्री आशुतोष महाराज जी की शैली हमेशा से विलक्षण रही है। महाराज जी ने हमेशा प्रयोगात्मक रूप से अपनी विचारधाराओं और कार्यों को समाज के सामने रखा है। जिसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं। इसी श्रंखला की अनुपम कड़ी है, श्री गुरु महाराज जी की गहनतम समाधि। वर्तमान में जिस प्रकार धर्म और संस्कृति पर आधारित अन्य मान्यताएं क्षीण हुई हैं, उसी प्रकार समाधि के आध्यात्मिक विज्ञान व दर्शन का भी समाज से लोप हुआ है। श्री गुरु महाराज जी ने इस लुप्त होते समाधि ज्ञान को पुनर्स्थापित करने के लिए भी प्रयोगात्मक रूप से स्वयं समाधि धारण की है। जिस प्रकार ऋषियों ने अपनी अंतरानुभूतियोंं के आधार पर भारतीय संस्कृति और मूल्यों की संरचना की, वैसे ही श्री गुरु महाराज जी के देश विदेश में रहने वाले अनुयायी ब्रह्मज्ञान की ध्यान साधना द्वारा अंतर जगत में ऐसी अनंत दिव्य अनुभूतियां प्राप्त कर रहे हैं। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि श्री आशुतोष महाराज जी की समाधि वर्तमान युग में सनातन -पुरातन गौरवशाली भारतीय संस्कृति को विश्व पटल पर अवश्य पुनर्स्थापित करेगी।
**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**
"श्री रमेश जी"
