संत/साधु-समाज चलता-फिरता तीर्थराज प्रयाग है जहां श्रीराम भक्ति रुप पाप
नाशिनीश्रीगंगाजी नित्य प्रवाहित रहतीहै
तथा ब्रह्म विचार का प्रचार सरस्वती जी हैं। उस संत समाज रुपी प्रयाग में अपने
धर्म में जोअटलविश्वासहै वह अक्षयवटहै
और शुभ कर्म ही उस तीर्थराज का समाज है। वह संत-समाजरुपीप्रयागराज
सब देशों , सब समय सबको सहज ही
प्राप्त हो सकता है और आदरसे सेवन
करने से कष्टों को नाश करने वाला है।
यह सत्य है -
सकलपदारथयहिजगमाहीं।
करमहीन नरपावतनाहीं।।
अतः वह संत/साधु-समाज रुप तीर्थराज
अलौकिक और अकथनीय है, और तत्काल फल देनेवाला है,उसकाप्रभाव
प्रत्यक्ष है –
अकथ अलौकिक तीरथराऊ।
देइसद्यफल प्रकट प्रभाव।।–
बालकांड, रामचरितमानस
प्रस्तुतकर्ता
डा०हनुमानप्रसादचौबे
गोरखपुर
