सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
परमात्मा है पूर्ण अस्तित्व। नियम है वो इस सृष्टि का परम नियम जिसमें नहीं है कोई पक्षपात, क्योंकि सार्वकालिक, सर्वव्यापक है वो। तुम खोज नहीं सकते किसी स्थान विशेष में उसको क्योंकि वो पूर्ण भी है और अखंड भी। जो केवल मंदिर में ही मिले वो घर में कैसे मिलेगा, जो केवल गिरजा में मिले तो मस्जिद में कैसे होगा क्योंकि खंडित होना है ये। इसलिए वो मंदिर में भी है मस्जिद में भी है, घर में भी है , यत्र तत्र सर्वत्र है वो। सब में है वो और सब के बिना भी है वो। खोज के नहीं मिलता वो बल्कि खोने से मिलता है वो। सब खोज और उपक्रम बंद हो जाते हैं जब और पूर्ण विश्राम में आ जाते हैं हम तो होता है ध्यान उपलब्ध तब। ध्यानी बनना होगा, ध्यान में डूबना होगा, मरना होगा, ध्यान में जब मिटना होगा तब उस तक पहुँच बनेगी। खोजोगे तो कभी भी ना पा पाओगे क्योंकि वो सदा ही तुममें है, खोया नहीं तुमसे, हाँ तुम्हें खोना होगा अपने आप को, अपने अहंकार को। खोजा उसे जाता है, जो अलग है तुमसे। इसलिए खोज व्यर्थ है। एक क्षण के लिए भी उसने छोड़ा नहीं हमें क्योंकि उसके बिना जीवित रह ही नहीं सकते हम, क्षणांश भी उसके बिना जीवन असंभव है। इस जीवन में ही तो परमात्मा है। स्वांस स्वांस में है वो। ध्यान से कपाट खोलो वो तो सदा ही मौजूद है।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
