**परमात्मा तक पहुंचने के लिए गुरु ही एकमात्र साधन है।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।


सभी धार्मिक शास्त्र-ग्रंथ, वेद-उपनिषद एक स्वर में ईश्वर के व्यापक प्रकाश रूप की पुष्टि करते हैं। वे परमात्मा के उज्ज्वल व ज्योति स्वरूप के बारे में स्पष्ट रूप से समझाते हैं।हमें इसी परम सत्य से अवगत कराने के लिए धरा पर अवतरित हुए दिव्य महापुरुष। उन्होंने ईश्वर के प्रकाश रूप की खुलकर महिमा गाई।

   हर धर्म ग्रंथ ने इस आदि सत्य को अपनी अपनी शैली में व्यक्त किया। समय व स्थानानुसार भाषा बदलती गई। पर सार तत्व वही रहा। जैसे कि द्वापरयुग में जगद्गुरु श्रीकृष्ण ने अर्जुन को परमात्मा के वास्तविक रूप से अवगत करवाते हुए कहा--

'ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमस: परमुच्यते।' (गीता 13/17) 

परमात्मा ज्योतियों की परम ज्योति है।अंधकार से परे है।

बाइबल मे कहा गया है-

God is light ; In him there is no darkness.  

_ईश्वर प्रकाश है। उसमें अंधकार लेशमात्र भी नहीं है।

अत:यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर का वास्तविक रूप प्रकाश है। इससे भी बढ़कर यह परम विधान है कि हम ईश्वर के इस ज्योति स्वरूप का दर्शन अपने अंतर्जगत मे कर सकते हैं।

  सभी के भीतर ईश्वर की ज्यति समाई है। उसी की जगमगाहट से सबमें जीवन का प्रकाश है। परंतु केवल गुरु की अनुकंपा से ही यह ज्योति अंतस में प्रकट होती है। इसके बाद ही साधक परमात्मा की वास्तविक आराधना कर पाता है।

तात्पर्य यह कि परमात्मा तक पहुंचने के लिए गुरु ही एकमात्र साधन है। सदगुरु ही हमारे भीतर आदिनाम को प्रकट कर ईश्वर का साक्षात्कार करवाते हैं।तदुपरांत हम शिष्य बनकर ज्ञान पथ पर बढ़ते बढ़ते अपने लक्ष्य प्रभु को प्राप्त कर पाते हैं। यही अटल नियम है। 'द लाइफ डिवाइन' के पृष्ठ 839 में महर्षि अरविंद कहते हैं- "ज्ञान प्राप्ति के समय शिष्य जो अपने अंतर में प्रकाश का दर्शन करता है, वह कोई स्वयं से दिखने वाला रूप नहीं है। वह तो परमात्मा का प्रकट रूप ही है, क्योंकि परमात्मा स्वयं प्रकाश रूप है।

  आज 'दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान' के संस्थापक व संचालक 'गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी' के कृपाहस्त तले करोड़ों जिज्ञासुओं ने भी अपने अंतर्जगत में ईश्वर का दर्शन किया है। "दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान" ग्रंथों में अंकित वाणियों व आध्यात्मिक अनुभवों को जनमानस के अंत:करण में प्रत्यक्ष कर रहा है। आप स्वयं खोजी बनकर आइए और प्रमाण लीजिये।

**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**

"श्री रमेश जी"

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