सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
एक शिष्य को अध्यात्म पथ पर बने रहने के लिए तीन चरणों को समझना चाहिये। -पहला चरण-- यह वह दौर है, जब साधक ज्ञान-दीक्षा लेकर ध्यान साधना आरंभ करता है। शुरु शुरु में एकाग्रता स्थापित करने में कठिनाई आती है। संघर्ष भी होता है, परंतु साधक को चाहिए कि वह निरंतर सत्संग विचार सुने। अनुभवी साधकों से विचार विमर्श करता रहे। गुरुदेव से भीतरी मार्ग दर्शन माँगता रहे। इन प्रेरणाओं के बूते वह सहजत: ज्ञान मार्ग पर चल सकता है।
-दूसरा चरण-- यह स्थिरता और ठहराव का दौर है। जब हम ध्यान साधना में बैठते हैं, तो एकाग्रता स्थापित करने का घोर प्रयास करते हैं। मन की लहरें कभी बहुत उफान के साथ ऊपर उठती हैं, तो कभी समुद्र के धरातल की तरह शांत हो जाती हैं। पर हम जैसे जैसे ध्यान में लीन होने लगते हैं, तो हम ये लहरें नहीं रहते। हम असीम गहराई वाले सागर ही बन जाते हैं। मतलब कि जो साधक शुरुआती संघर्ष से गुजर जाते हैं, वे पाते हैं कि उनका ध्यान आज्ञा चक्र पर टिकने लगा है। ज्ञान मार्ग पर उनकी रुचि बढ़ गई है।विकारों और वासनाओं का जोर कम हो गया है। ऐसे तृप्त साधक आगे बढ़ते रहते हैं। -तीसरा चरण-- ब्रह्मज्ञान के मार्ग पर जैसे जैसे साधक साधना में स्थिर होता है, उसके दिव्य अनुभव और बोध उत्तरोतर विकास को प्राप्त होते जाते हैं। नित नूतन अनुभूतियां उसके हृदय में खिलती हैं।जीवन के हर स्तर पर परिवर्तन की ताजगी दिखाई देती है। यही कारण है कि ब्रह्मज्ञान का कर्मठ साधक कभी ऊबता नहीं है। स्थायी और अनंत रूप से बढ़ता जाता है।
जब साधक का जीवन सँवरता है तो वह चुप नहीं बैठ सकता। वह जान जाता है कि इसी ब्रह्मज्ञान से संसार में सद्भावना स्थापित की जा सकती है। ऐसे में साधकगण अपने संपर्क में आए हर व्यक्ति को ब्रह्मज्ञान से जुड़ने की प्रेरणा देते हैं। इससे ज्ञान का प्रचार प्रसार बढ़ता है।स्वामी विवेकानंद कहते हैं- शिष्यों को चाहिए कि वे आग की तरह फैल जाएं और ईश्वर के सार्वभौमिक ज्ञान का प्रचार करें।
**ओम् श्रीआशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
