सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
आमतौर पर जब कोई व्यक्ति किसी को उसकी खुशी या सफलता पर बधाई देता है, तो पता नहीं क्यों उस व्यक्ति की वाणी में इर्ष्या का गुप्त स्वर भी सुनाई देता है। मानो वह बनावटी शब्दों से तो खुशी दिखा रहा है, पर उसके हृदय के भावों में द्वेष की जलन है।
वहीं, जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे के दुर्भाग्य एवं विपत्ति के लिए सहानुभूति व्यक्त करता है, तो उसकी सहानुभूति के स्वरों में एक गुप्त खुशी और संतुष्टि सुनाई देती है। जैसे कि सामने वाले को दिलासा देने वाला वास्तव में खुश है।
सज्जनों आप स्वयं भी विचार कीजिए.. आज संसार में जब भी हमारे अश्रुओं मे 'आह' होती है, तो कहीं न कहीं दूसरी ओर से 'वाह' सुनाई दे जाती है।जब भी हमारी मुस्कान में 'वाह' होती है तो कहीं किसी कोने से 'आह' सुनने को मिल जाती है। जरा सोचिए... क्या सच में ऐसे पराएपन के एहसासों ने हमें हर पल नहीं छुआ है?
तो क्या जीवन में कोई ऐसा भी हो सकता है जो हमारी खुशी में हमसे भी ज्यादा प्रफुल्लित और हमारे दुःख में हमसे भी ज्यादा चिंतित हो उठे? कौन है ऐसा जो केवल सांत्वना ही नहीं, अपितु समाधान भी प्रदान करे? वो हैं हमारे सदगुरु!!
सज्जनों, जीवन का आधार ही अनुभव है, जो अभिव्यक्त होकर अपना प्रमाण स्थापित करता है।एक ऐसा ही घटित घटना, दुर्घटना हमारे साथ हुआ जो आपसे साझा करने जा रहे हैं।
एक दिन की बात है, हम अपनी पत्नी तथा मां के साथ अपने गांव बिहार से अपनी ही कार से गोरखपुर आ रहे थ। अचानक रास्ते में एक बाइक सवार ने हाथ दिखाया और दाहिने की ओर मुड़ गया। अगर वो दाहिने की ओर चला जाता तो ठीक था। लेकिन वो बीच सड़क पर धीमी गति से चल रहा था। मैंने पूरा ब्रेक लगाया और हार्न दिया। मेरी गाड़ी रूकते रूकते भी उस बाइक से टच हो गया। बाइक सवार गिर गया था। हम अपनी कार से उतर गए। साथ में पत्नी भी उतर गई।
धीरे धीरे वहाँ भीड़ इकट्ठी होने लगी। कोई कह रहा था कि मारो, तो कोई कह रहा था कि दश हजार रुपए लो तो कोई कह रहा था बीस हजार लो। हम डरे हुए थे। महाराज जी को शुक्रिया अदा कर रहे थे कि हमारे हाथों से उस व्यक्ति की मृत्यु नहीं हुई थी। हम पति पत्नी हमेशा महाराज जी का सुमिरन करते रहते हैं। उस समय भी दोनों आदमी सुमिरन कर रहे थे।और महाराज जी से प्रार्थना कर रहे थे कि महाराज जी अब आप ही इस मुशीबत से निकाल सकते हैं।
तभी अचानक से, सफेद कपड़े पहने एक आदमी जोर से बोला... मैं दूर से खड़ा सब देख रहा था। इस दुर्घटना में आपकी कोई गल्ती नहीं है। इसलिए आप यहाँ से जाइए। जहाँ सारे स्वर पराए और विरोधी थे, ऐसे माहौल में सच्ची सांत्वना और संबल भरे शब्द सुनने को मिले। हममें हिम्मत आई, पत्नी की तरफ इशारा किया और वहाँ से चल दिए। हम निरन्तर महाराज जी को याद करते हुए कह रहे थे... महाराज जी, केवल आप ही इस परिस्थिति को संभाल सकते हैं।
और ध्यान दीजिएगा उनके स्वरों पर भी। मेरी विपत्ति को उनका अपनी विपत्ति समझने का स्वभाव। मेरी वेदना में उनकी सच्ची संवेदना का भाव। इसीलिए हम बड़े गर्व से अपने सदगुरु "श्री आशुतोष महाराज जी" को पूर्ण कहते हैं।
कितने ही लोग हैं आज हमारे जीवन में, परन्तु उनमें से कितने हैं जो हमारे सच्चे हमसफर हैं? तो क्यों न ऐसा दिव्य साथी चुन लें जो हमें आने वाली हर बाधा से परिचित करा दे। हर भटकाव से बचा ले।
मुझे यह कहने में जरा सा भी अंतर्द्वंद्व महसूस नहीं होता है कि अगर इस संसार में कोई ऐसा परम पुरुष, कोई ऐसा रिस्ता, कोई ऐसा हमसफर और पथ प्रदर्शक है-- तो वे केवल मेरे पूर्ण ब्रह्मनिष्ठ "सदगुरु श्री आशुतोष महाराज जी" हैं।
**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**
"श्री रमेश जी"
