श्री गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय सखा अर्जुन से कहा–धनंजय!मैं
अजन्मा, अविनाशी, दृश्य-अदृश्य, प्राप्त -
अप्राप्त सब कुछ मैं ही हूं। इसीलिए जब -जब संसार मे धर्म/पुण्य की हानि होती है और अधर्म/पाप की बृद्धि होती है,पापियों/अत्याचारियों से पीड़ित पृथ्वी,सज्जनतथागौ कराहते तथा मुझे पुकारते हैं तब-तबअपनीत्रि-गुणात्मिका माया/शक्ति या प्रकृति को अपने वश में करमैं पृथ्वी पर अवतरित होता हूं तथा दुष्टों का संहार,पृथ्वी का उद्धार, सज्जनों का कल्याण,धर्मकी स्थापना तथा भक्तों की रक्षा/ दर्शन देता हूं।–
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवतिभारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्यतदात्मानंसृजाम्यहम्।।
परित्राणायसाधूनांविनाशायचदुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थायसंभवामियुगेयुगे।।
–अ०४,श्लोक७-८
अर्जुन! जो मेरे जन्म और मेरे कर्मको
लौकिक एवं सांसारिक नहीं बल्कि
अलौकिक और असांसारिक जानताहै,
समझता है, वह जन्म -मरणसे परे हो
कर मुझे प्राप्त होता है -अ०४,श्लोक९
प्रस्तुतकर्ता
डां०हनुमानप्रसादचौबे
गोरखपुर।
