श्री गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा-
अर्जुन!जैसे मैल/धूल से दर्पण ढक/छिप जाता है उसी तरह काम/अज्ञान से ज्ञान ढक/छिप जाता है।काम/अज्ञान के निवास स्थानहैं–
१-पांचज्ञानेंद्रियां–कान,आंख,जीभ,नाक तथा चमड़ी।ये शरीर-रथ के पांच घोड़ेंहैं।
२–मन–यह लगाम है।तथा
३–बुद्धि–यह शरीर-रथ को चलाने वाला सारथि है।
यह काम/अज्ञान पांच
ज्ञानेंद्रियों,मन तथा बुद्धि से ज्ञान(वस्तु/आत्मा के असलरुप)
को ढककर देही/आत्मा को मोहित करता है।अतः अर्जुन!तू पहले अपनी पांचज्ञानेंद्रियों कोवशमेंकरके इसज्ञान को नाश करने वाले बड़े पापी/दुष्ट काम/अज्ञान को अवश्य बल से मार। इन पांच ज्ञान इन्द्रियोंसे बली
मन है और मन से बली बुद्धि तथा बुद्धि से बली आत्मा है।–
इंद्रियाणिमनोबुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोयत्येषज्ञानमावृत्यदेहिनम्।।
तस्मात्त्वमिंद्रियाण्यादौनियम्यभरतर्षभ।
पाप्मानंप्रजहिह्येनंज्ञानविज्ञाननाशनम्।।
इंद्रियाणिपराण्याहुरिंद्रियेभ्य:परंमन:।
मनसस्तुपराबुद्धिर्योबुद्धे:परतस्तुस:।।
–अ०३, श्लोक ४०-४२
प्रस्तुतकर्ता
डां०हनुमानप्रसादचौबे
गोरखपुर।
