सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
चिरकाल से नेति नेति कहकर जिस ब्रह्म का वर्णन वेद पुराण करते आ रहे हैं, उस निर्गुण ब्रह्म को गुरुदेव अंतर्घट में सहज ही दिखा देते हैं। ब्रह्मज्ञान की साधना द्वारा अंतर्घट में अनंत सूर्यों का प्रकाश दिखाई देता है। अंतर्जगत में दिव्य साक्षात्कार होने लगते हैं। समस्त दुखों का नाश हो जाता है।
जिस प्रकार कछुआ अपने समस्त अंगों को अपने कवच के अंदर समेट लेता है। ठीक वैसे ही गुरु त्रिकुटी पर ध्यान लगाकर सुमिरन करने की ऐसी विधि बताते हैं कि जिसके अभ्यास से हम अंतर्मुखी हो जाते हैं और सारी इन्द्रियों को वश में कर लेते हैं। ब्रह्मज्ञान की इस सुमिरन विधि से चंचल मन पर भी काबू पाया जा सकता है।
सदगुरु कोई शिक्षक नहीं होते, जिन्होंने अपना विषय पढ़ाया और चल दिए।असल में ब्रह्मज्ञान के स्रोत भी गुरुदेव हैं और शिखर भी गुरुदेव ही हैं। और इस शिखर तक पहुँचाने वाले माध्यम भी वे स्वयं ही हैं।ज्ञान मार्ग पर चल पाना अगर संभव है, तो वह उन्हीं की दिव्य अनुकंपा से है।क्योंकि यह गुरुदेव का अनुपम स्वरूप ही है, जिसके चिंतन मात्र से मन ध्यानस्थ हो जाता है।
सदगुरु बाहर से मानुष रूप दिखते हैं, पर वे तत्त्वतः साक्षात ब्रह्मस्वरूप हैं। तभी तो उनके दर्शन मात्र से मन अपना अस्तित्व खो देता है। उन्हीं की अनुकंपा से मन आत्मरूप मे लीन हो पाता है।
"गुरु हैं सब देवन के देव।
गुरु को कोउ न जानत भेव।।
करुणा सागर कृपा-निधान।
गुरु हैं ब्रह्मरूप भगवान।।
**ओम् श्रीआशुतोषाय नमः**
" श्री रमेश जी "
