**मानव में क्रांति और विश्व में शांति केवल 'ब्रह्मज्ञान' द्वारा संभव है।**

  सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

   

अंतरात्मा हर व्यक्ति की पवित्र होती है, दिव्य होती है। यहाँ तक कि दुष्ट से दुष्ट मनुष्य की भी। आवश्यकता केवल इस बात की है कि उसके विकार ग्रस्त मन का परिचय उसके सच्चे, विशुद्ध आत्मस्वरूप  से कराया जाये। 

यह परिचय बाहरी साधनों से सम्भव नहीं है। केवल 'ब्रह्मज्ञान' की प्रदीप्त अग्नि ही व्यक्ति के हर पहलू को प्रकाशित कर सकती है। यही नहीं, आदमी के नीचे गिरने की प्रवृति को 'ब्रह्मज्ञान' की सहायता से उर्ध्वोमुखी या ऊँचे उठने की दिशा में मोड़ा जा सकता है। इससे वह एक योग्य व्यक्ति और सच्चा नागरिक बन सकता है। 

  'ब्रह्मज्ञान' प्राप्त करने के बाद साधना करने से आपकी सांसारिक जिम्मेदारियां दिव्य कर्मों में बदल जाती हैं। आपके व्यक्तित्व का अंधकारमय पक्ष दूर होने लगता है। विचारों में सकारात्मक परिवर्तन आने लगता है और नकारात्मक प्रविर्तियाँ दूर होती जाती हैं। अच्छे और सकारात्मक गुणों का प्रभाव आपके अन्दर बढने लगता है। वासनाओं, भ्रांतियों और नकारात्मकताओं में उलझा मन आत्मा में स्थित होने लगता है। वह अपने उन्नत स्वभाव यानि समत्व, संतुलन और शांति की दिशा में उत्तरोत्तर बढता जाता है। यही 'ब्रह्मज्ञान' की सुधारवादी प्रक्रिया है |

   अगर हम जीवन का यह वास्तविक तत्व यही 'ब्रह्मज्ञान' प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें सच्चे सदगुरू की शरण में जाना होगा। वे आपके 'दिव्यनेत्र' को खोल कर, आप को ब्रह्मधाम तक ले जा सकते हैं, जहाँ मुक्ति और आनन्द का साम्राज्य है। सच्चा सुख हमारे अन्दर ही विराजमान है, लेकिन उसका अनुभव हमें केवल एक युक्ति द्वारा ही हो सकता है, जो पूर्ण गुरू की कृपा से ही प्राप्त होती है। इस लिए ऐसा कहना अतिश्योक्ति न होगा कि सदगुरू संसार और शाश्वत के बीच सेतु का काम करते हैं। वे क्षणभंगुरता से स्थायित्व की ओर ले जाते हैं। हमें चाहिए कि हम उनकी कृपा का लाभ उठाकर जीवन सफल बना लें। 

मानव समाज की दम तोड़ती मानवता को यदि कोई बचा सकता है तो वह है 'दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान'

**ओम् श्री आशुतोषाय नम**

"श्री रमेश जी"

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