सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
भारतीय संस्कृति मृत्युंजय है। भारत का सांस्कृतिक कोष अक्षय है, क्योंकि इसका आधार आर्ष ग्रंथ वेद है। "सर्वज्ञानमयो हि स:" अर्थात वेद समस्त ज्ञान का भंडार है, "अनन्ता वै वेदा:" अर्थात वेदों का ज्ञान अनंत है। चार वेद-- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद अनंत ज्ञान को अपने गर्भ में समेटे हैं। वेद शब्द की उत्पत्ति 'विद्' (ज्ञाने) धातु से हुई है, जिसका अर्थ है 'जानना'।वेद ब्रह्मज्ञान का आलोक है। अंतर्दृष्टि द्वारा 'ब्रह्म' का साक्षात्कार करना ही वेद विदित ब्रह्मज्ञान है। ब्रह्मज्ञान धर्म का प्रयोगात्मक पक्ष है, सैद्धांतिक नहीं। इसलिए पवित्र वेद ईश्वर के दर्शन की बात करते हैं। अथर्ववेद इस तथ्य को स्पष्ट करता है--
"अतिसन्तं न जहात्यन्मि सन्तं न पश्यन्ति।
देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति।।" (10/8/32)
अर्थात, अत्यंत निकट होते हुए भी मनुष्य परमात्मा को देख नहीं पाता और उसे छोड़ भी नहीं सकता। दिव्य गुण सम्पन्न परमात्मा के वेदरूपी काव्य को 'देखो', वह काव्य न कभी मरता है और न कभी पुराना ही होता है। वेद शाश्वत सनातन ज्ञान है।
धर्म पथ से भ्रष्ट होकर मानव संसार में जब जब अज्ञानांधकार के कारण अपने अंतर में निहित ज्ञान से भटका, तब तब ईश वाणी वेदों ने संसार के समक्ष ब्रह्मज्ञान की ज्योति को प्रकट कर अंधकार से प्रकाश की ओर चलने का आदेश दिया और कहा "तमसो मा ज्योतिर्गमय"।वर्तमान युग में हम अपनी गौरवशाली अध्यात्म पोषित संस्कृति को भूलकर गहन अंधकार का अनुसरण कर रहे हैं। हम आध्यात्मिक विजय नहीं लौकिक विजय को पूज रहे हैं। परिणाम स्वरूप विश्व में अधर्म, अशांति, अराजकता, अनैतिकता, हिंसा, वैमनस्य व बँटवारे का साम्राज्य है। आज पुनः विश्व में एकता, बंधुत्व, शांति, अहिंसा व नैतिकता के गुणों की स्थापना करने की आवश्यकता है। जो केवल तभी संभव है, जब प्रत्येक मनुष्य में धर्म की नींव सुदृढ़ होगी।
उपरोक्त परिस्थितियों के चलते आज विश्व को अनमोल निधि वेद ज्ञान से विभूषित करने हेतु युग प्रवर्तक दिव्य व्यक्तित्व "श्री आशुतोष महाराज जी" ने तीन दशक पूर्व "दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान" की स्थापना की। श्री आशुतोष महाराज जी के दिव्य प्रेरणा व संरक्षण में प्रत्येक मानव में ब्रह्मज्ञान आरोपित कर शांतिपूर्ण सुंदर विश्व की परिकल्पना को साकार रूप मिल रहा है।
**ओम् श्रीआशुतोषाय नमः**
"श्री रमेश जी"
