श्री शुकदेवजी ने श्रीगंगाजी के तटस्थित मुमुक्षुराजा परीक्षित को बताया कि ब्रह्मा
जीने अपने मानसपुत्र बड़े विष्णुभक्तनारद मुनि से कहा –बेटा नारद! जैसे सूर्य, चंद्र,
अग्नि,ग्रह,नक्षत्र और तारेभगवान् श्री कृष्ण के प्रकाश से आलोकितहोकर
संसार में प्रकाश फैलाते हैं, वैसे मैं ब्रह्मा भी उन्हीं स्वयं प्रकाश भगवान् श्रीकृष्ण
के चिन्मय प्रकाश से आलोकितहोकर
संसार को प्रकाशित कर रहाहू।उन
भगवान् वासुदेव की वंदना और ध्यान
मैं निरंतर करता हूं जिनकी दुर्जय माया से मोहित होकर लोग मुझब्रह्माको जगत्
गुरु कहते हैं। यह माया तो उनके सामने
ठहरती नहीं, परंतु संसार के अज्ञानी लोग
उसी माया से मोहित होकर ‘यहमैंहूं,यह
तुम हो,यह मेरा है,यहतेराहै’ऐसाबकते
रहते हैं।
भगवत्स्वरुप नारद!द्रव्य(पदार्थ, वस्तुएं),
कर्म,काल,स्वभाव(प्रकृति) औरजीव/
प्राणी–वास्तवमें भगवान् से अलग कुछ
नहीं है। सभी देवता भी भगवान् केही अंगों में कल्पित हुए हैं। उसी भगवान् ने
मुझ ब्रह्मा को बनाया हैऔर उनकी दृष्टि
सेप्रेरितहोकरमैं उनकी इच्छानुसार सृष्टि
रचना करता हूं। भगवान् श्रीकृष्ण त्रिगुण-
अतीत तथा अनन्य हैं।
द्वितीय स्कंध,अ०५,श्लोक९-१८
प्रस्तुतकर्ता
डांं०हनुमानप्रसादचौबे
गोरखपुर।
