रेनेसां यूनिवर्सल क्लब के बैनर तले एक तत्त्वसभा आयोजित की गई जिसका विषय था 'समाज मे धर्म की उपयोगिता"।

 

      मुख्य अतिथि श्री आचार्य परमेश्वरा नन्द अवधूत जी, 

       संबोधित करते हुए साथ में है डॉ रंजना बागची जी

*पूंजीवाद और मार्क्सवाद का एकमात्र वैकल्पिक सामाजिक-आर्थिक दर्शन "प्रउत"*

*प्रउत (प्र-प्रगतिशील, उ-उपयोग, त-तत्व)*

 (प्रउत के दार्शनिक विचार इस स्तम्भ में क्रमवार प्रकाशित हो रहे हैं।)

आध्यात्मिक साधना : भाति का दूसरा तत्व

*Psycho-Ritualistic Observance*

गोरखपुर,मानव धर्म पर ,मुख्य अतिथि पद से बोलते हुए आचार्य परमेश्वरा नन्द अवधूत जी ने बताया कि धर्म का अस्तित्व मनुस्य के आदिकाल से है, जिसे हम मानव धर्म , भागवत धर्म अथवा सनातन धर्म कहते है।उन्होंने जीवन मे ब्रम्ह साधना के महत्व और उसकी आवस्यकता पर गहन चर्चा की।मनुस्य मात्र को ही यह सुयोग प्राप्त है कि धर्म साधना से जीवन के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर सके। बाद में, लोगों ने उन सभी मूर्तियों या भौतिक वस्तुओं के लिए जिन्हें वे पूजा करते थे, एक दर्शन खोज लिया। सीमित वस्तुओं के माध्यम से असीम को प्राप्त किया जा सकता है, यह मानकर उन्होंने ईंटों से बने मंदिर-मस्जिद आदि को पवित्र मानकर उनकी पूजा-अर्चना शुरू कर दी। इस प्रकार भौतिक वस्तुओं के साथ रहते-रहते, उन्हें आराध्य मानते-मानते एक दृढ़ मनोभाव बन गया—यह मनोभाव पूरी तरह से अंधा है। इस प्रकार सेंटिमेंट के कारण विशेष आचार-प्रथाओं (Ritualistic observance) का जन्म हुआ—जैसे दीपक को इस प्रकार जलाना होगा, इस प्रकार पकड़ना होगा, इस प्रकार बैठना होगा, इस प्रकार खड़ा होना होगा, इतनी बार कान पकड़ना होगा, इतनी बार घुटने टेकने होंगे, इतनी बार नाक से खट देना होगा आदि आदि। ये सभी अंधविश्वास पर आधारित विधि-व्यवस्था हैं। इसके पीछे कोई तर्क नहीं मिल सकता।

श्री श्री आनंदमूर्तिजी उर्फ श्री प्रभात रंजन सरकार द्वारा रचित पुस्तकों समूह से संगृहीत और संकलित पुस्तक "प्राउट की रूपरेखा" से प्रस्तुत।


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