सोचता हूं ।

 

संत शिरोमणि महात्मा तुलसीदास जी ने अपने महाकाव्य “रामचरितमानस”में संत/

साधु-समाज को सदा आनंद तथा कल्याणकारी और चलता-फिरता तीर्थराज प्रयाग कहा है तथा उनकी श्रीरामभक्ति को महापापविनाशिनी श्रीगंगाजी।यह साधु समाज प्रयाग अलौकिक और अकथनीय है और तुरन्त फल देनेवाला है, इसका प्रभाव प्रत्यक्ष है।जोनर इसका प्रभाव प्रसन्न मनसे सुनते और समझते हैं और फिर अत्यन्त प्रेमसे इसमें डुबकी

लगाते हैं,वे इस शरीर के रहते ही चार फल(चार पदार्थ,पुरुषार्थ)- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष -पाजातेहैं।

इस तीर्थ राज प्रयाग में स्नान का फल तुरंत ऐसा देखने में आता है कि कौए कोयल बन जाते हैं और बगुले हंस।यह संदेह से परे है, क्योंकि –

बालमीक नारद घट जोनी।

निज निज मुख निकही निजहोनी।।

जलचर थलचर नभचर नाना।

जे जड चेतन जीव जहाना।।–

           बालकांड

           प्रस्तुतकर्ता 

     डां०हनुमानप्रसाद चौबे 

            गोरखपुर।

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