**प्लेटो ने कहा है- 'राजा को ब्रह्मज्ञानी होना चाहिए, नहीं तो किसी ब्रह्मज्ञानी को ही राजा बनाना चाहिए। '**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

भरत को जब परिस्थिति वश अयोध्या का राज्य मिला, तो वे विनम्रता से श्री राम को लौटा देते हैं। 14 वर्षों तक श्री राम के प्रतिनिधि बनकर कार्य करते हैं। चित्रकूट में अयोध्या की विशाल सेना देखकर लक्ष्मण श्री राम से कहते हैं कि  'अवश्य ही भरत को राजमद हो गया है। इसलिए सेना रच कर लाया है।'

   किंतु श्री राम कहते हैं  'हे तात! भरत को ब्रह्मा, विष्णु और महादेव का पद पाकर भी राजमद नहीं होने वाला।

   श्रीमद्भागवत में वर्णित है कि वेन नामक राजा की दुष्टता बहुत अधिक बढ़ गई थी। इसलिए उस कुमार्गी वेन को मुनियों ने अपने श्राप से मार दिया। फिर उसके पुत्र पृथु को राज्य पद पर बिठाया। ये राजा प्रजा के प्रति निष्ठावान एवं मंगल कारी थे।

   श्रुति के अनुसार राजा भरत ने अपने जीवन में भलीभांति प्रजा पालन किया। संसार से उदासीन होने पर अपने उत्तराधिकारी की खोज प्रारंभ की। किंतु उन्हें अपने पुत्रों में कोई योग्य उत्तराधिकारी नहीं दिखाई दिया। तब उन्होंने नारदजी से प्रार्थना की 'आप तो ब्रह्मज्ञानी हैं। आप साधना में बैठिये और मेरा मार्गदर्शन कीजिए। 'इस प्रकार राजा भरत ने अपने उत्तराधिकारी को पुत्रमोह नहीं, संत के विवेक के अनुरूप खोजने का निर्णय लिया।

  आज के बुद्धिजीवी कहते हैं कि राजनीति समाज की व्यवस्था है। इस व्यवस्था को केवल संवैधानिक और शासकीय नियमों में बाँधा जाना चाहिए। नि:संदेह, बात तो सही है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या केवल शासकीय और संवैधानिक व्यवस्थाएं सुदृढ़ राजनीतिक तंत्र के लिए पर्याप्त हैं? क्या इन्हीं के द्वारा हमारा देश भीतरी और बाहरी कुचक्रों को पूर्णविराम दे सकता है?अगर वर्तमान परिस्थिति को देखें, तो साफतौर पर उत्तर 'न' ही मिलता है।जिस आपसी टकराव से हम बचना चाहते हैं, वह आज चरम पर है।

  अतः उपरलिखित उदाहरणों की मानें, तो 'अध्यात्म/तत्वज्ञान' का संबल राजनीति व राजनीतिज्ञों के साथ जुड़ना चाहिए। सांप्रदायिकता या जातियता का भेदकारी बल नहीं, सार्वभौम ब्रह्मज्ञान और उससे उपजे शुद्ध विवेक का संबल होना चाहिए। प्लेटो ने कहा भी है कि-- "राजा को ब्रह्मज्ञानी होना चाहिए, नहीं तो किसी ब्रह्मज्ञानी को ही राजा बनाना चाहिए।

**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**

"श्री रमेश जी"

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