श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण
पांडव अर्जुन से कहते हैं -अर्जुन! जो मनुष्य विना किसी इच्छा केअपने आप
मिले वस्तुओं में हमेशा खुश रहता है, किसी से द्वेषपूर्ण व्यवहार नहीं करता,
कभी सुख-दु:ख, लाभ-हानि, यश-अपयश आदि द्वंद्वों से उद्विग्न नहीं
होता , ऐसा सिद्धि और असिद्धि को
बराबर समझने वाला मनुष्य कर्मयोगी
होता है और सब कर्म करता हुआभी किसी कर्म--बंधन में नहीं बंधता। अर्जुन!
जिसकी आसक्ति/मोह अच्छी तरह नष्ट हो गया है, जो शरीर तथा आत्मा में भेद/
अंतरजानताहै,’यहमेराहै’सेमुक्तहोगयाहै,
जिसका चित्त/मन लगातार अविनाशी
नित्यवस्तुईश्वरकेज्ञानमेंलगारहताहै,ऐसा
केवलयज्ञ/जनहितार्थ कर्म करने वाले
मनुष्य के सब कर्म अच्छीतरह विलीन हो
जाते हैं,संसार-बंधननहींहोता।–
श्लोक २२-२३,अध्याय४
प्रस्तुतकर्ता
डां०हनुमानप्रसादचौबे
गोरखपुर।
