**मानव जन्म लेना कठिन नहीं है, मानव बनना कठिन है। मानव बनने का अर्थ है, चेतना युक्त होना।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

हमारे अंतर्जगत में राम भी हैं और रावण भी है। राम परमात्मा हैं, आत्मा के रूप में हमारे भीतर स्थित हैं।राम का अंतर्जगत में जागरण ही 'धर्म' है। परंतु यदि भीतर के राम सुषुप्त हैं, तो व्यक्तित्व में अधर्म का ही प्रतिफल दिखाई देगा अर्थात रावण का वर्चस्व रहेगा।

   रावण अज्ञान का प्रतीक है। अज्ञान के कारण मानव में देहाभिमान और देहासक्ति की स्थिति बनी रहती है। अर्थात मानव का स्वयं को देह मात्र ही समझना, इसलिए भोग कामुकता व इंद्रियों के सुखों मे लिप्त रहना-- यही अधर्म है।

   आधुनिक वर्ग कहता है-- 'तो इसमें क्या हानि है? यह तो स्वाभाविक है, प्राकृतिक है'। परंतु अध्यात्मविदों का दृष्टिकोण भिन्न है। संत कबीर दास कहते हैं--

"पर नारी पैनी छुरी, मत कोई लावो अंग।

रावण के दस सिर गए, पर नारी के संग।।"

  अर्थात पर नारी या पर-पुरुष का संग करने से मानव के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का पतन होता है। उसके मानवीय गुण, नैतिक मूल्य इत्यादि.. सबके सब लुट जाते हैं।

  रामचरित मानस के बालकाण्ड में वर्णन आता है कि कामदेव ने महादेव की समाधि भंग करने के उद्देश्य से अपने (काम वासना के) प्रभाव का विस्तार पूरी सृष्टि में कर दिया था। इसकी तुरंत प्रतिक्रिया हुई। सृष्टि से विवेक का लय हो गया।संयम, धैर्य, धर्म, ज्ञान, जप,योग सब ग्रंथों में छिप गया। इसके फलस्वरूप सम्पूर्ण समाज, योगीजन तक काम के प्रभाव में आ गए। तब महादेव ने अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा से कामदेव को भस्म किया और पुनः सृष्टि को धर्म सम्मत एवं विवेकशील स्थिति प्रदान की।

  आज समाज में वासना वृत्ति इस प्रकार उछाल मार रही है कि मानव का चिंतन विकृत हो चुका है। हर ओर कामुकता का पसारा है।सामाजिक मूल्यों व आदर्शों को "It's My Life" की आरी चलाकर तार तार कर रहे हैं।

"ऐसे मे क्या करें??"

   दिव्य गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी कहते हैं-- "मानव जन्म लेना कठिन नहीं है, मानव बनना कठिन है। मानव बनने का अर्थ है, चेतना युक्त होना। मानव बनने का अर्थ है-- ऊर्ध्वमुखी होना, अधोमुखी नहीं।"

   ऊर्ध्वमुखी होना 'राम' की ओर उच्च यात्रा है।अधोमुखी होना रावण रूपी खाई में गिरना है। श्री राम चेतना (आत्मा) के रूप में माथे पर ऊर्ध्व स्थान- 'आज्ञा चक्र' में स्थित हैं। वहीं रावण अधोस्थान 'मूलाधार चक्र' मे स्थित है। 'ब्रह्मज्ञान' जो आत्मा के जागरण की सनातन प्रक्रिया है--  जब सदगुरु उसमें दीक्षित करते हैं और साधक साधना का सतत अभ्यास (ध्यान) करता है, तब इस ऊर्जा के प्रवाह को पलटा जा सकता है। उसे ऊर्ध्वमुखी किया जा सकता है।

**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**

"श्री रमेश जी"

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