सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
सदगुरु की सेवा वह अमृत है, जो विकारों से विषैले और काले मन को धोकर निर्मल सुमन बना देती है!यह वह चंद्रहास खड्ग है, जो जन्म जन्मांतरों की कर्म जंजीरों की एक एक कड़ी को छिन्न भिन्न कर देती है।गुरु की सेवा तो वह दिव्य सीढ़ी है, जिसका एक सिरा यहाँ मृत्यु लोक की दुख सुख रूपी कीच में होता है; पर दूसरा छोर सीधा बैकुण्ठ के उच्चतम शिखर पर होता है। सदगुरु सेवा वह ज्वाला है, जिसका ताप धर्म राज के पास पड़ा शिष्य के संस्कारों का लेखा जोखा जलाकर राख कर देता है।
स्वामी योगानंद परमहंस अपनी आटोबायोग्राफी में लिखते हैं-- "स्थूल शरीर से मुक्ति पाने के लिए हमारा जन्म इस पृथ्वी पर होता है।पर हम इस संसार में इतना उलझ जाते हैं कि इसे कभी छोड़ना ही नहीं चाहते। यहाँ तक कि मृत्यु के बाद भी हमारी स्थूल लोक की अधूरी इच्छाएँ व ऐंद्रिक वासनाएँ हमें पुनः खींचकर स्थूल शरीर में ले आती हैं- कभी पशु, कभी इंसान, कभी अन्य जीव बनाकर।इस कारण जन्म मरण के चक्कर में जीवात्मा के हजारों साल बीत जाते हैं; पर वह स्थूल शरीर से मुक्ति नहीं प्राप्त कर पाता।"
गुरु प्रिय साधकों!सोचिए, जो फल हजारों युगों की भटकन के बाद कठिन साधना से प्राप्त होता है, वह फल पूर्ण सदगुरु की सेवा से मिल जाता है। यह है सदगुरु की सेवा का प्रताप! इसलिए सदगुरु के दरबार में की गई सेवा कोई काम या मजदूरी नहीं होती, बल्कि अपने कर्मों को काटने का साधन होती है।
'आराधना में भावना की अधिकता रहे,
फिर साध्य संग प्रगाढ़ता नित निरंतर बहे,
बदलाव जिंदगी में फिर लाए आराधना।'
**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**
"श्री रमेश जी"
