सोचता हूं ।

 

श्री मद्भागवत महापुराण में श्री शुकदेव जी ने पांडव अर्जुन को ‘मैत्रेयजी-विदुर-

संवाद ‘सुनाया–अर्जुन! व्यास नंदन विदुर

जी ने मैत्रेय जी से पूछा –ब्रह्मन् ! परमात्मा/भगवान् तो शुद्ध ज्ञान स्वरूप, निर्विकार,निर्गुण, नित्य तृप्त,पूर्ण काम तथा असंग़ हैं,वे परमात्मा क्रीड़ा/लीला के लिए भी क्यों संकल्प/विचार करेंगे? उनका माया के साथ किस प्रकार संयोग हो सकता है?

तत्त्वविद् मैत्रेय जी ने भगवान् का स्मरण

करते हुए मुस्कराते हुए कहा –विदुरजी!

जो भगवान्/आत्मा सबका स्वामी और सर्वथा मुक्त स्वरुप है,वहीआत्मा दीनता

और बंधन को प्राप्त होता है – य़द्यपि

यह बात युक्ति विरुद्ध अवश्य है, परंतु 

यह सही है, असल में यही तो भगवान् की

माया/प्रकृति/लीला है। जैसे स्वप्न देखने

वाले मनुष्य को अपना सिर कटना, हवा में उड़ना, जंगल में भटकना, नदी में 

डूबना आदि कार्य न होने पर भी अज्ञान के कारण सही से़ लगते/भासते हैं,वैसे ही इस जीव/जीवात्मा को बंधनादि न होते हुए भी अज्ञान/अविद्या के कारण भास/लग रहे हैं।यदि यह कहा जाय कि फिर भगवान्/ईश्वर में ऐसा क्यों नहीं होता,तो इसका उत्तर यह है कि जैसे जल में होने वाली कम्पन आदि क्रिया जल में दीखने वाले गगनस्थ चंद्रमा के प्रतिबिम्ब में न

होने पर भी कम्पन आदि क्रिया भासती

है, परंतु गगनस्थ चंद्रमा में नहीं, वैसे ही 

देहाभिमानी/देहको ही आत्मा मानने वाले 

जीव में ही देह के असत्यधर्मों(सुख-दुख,

छोटा–बडाआदि)की प्रतीति होती है, भगवान् में नहीं। भगवान् स्वतंत्र और जीव(माया/प्रकृतिस्थ आत्मा) परतंत्र है।

   स्कंध३,अध्याय७, श्लोक १-११

                प्रस्तुतकर्ता 

         डां०हनुमानप्रसादचौबे

                  गोरखपुर।

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