सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
पूर्ण महापुरुषों की चाहे भाषा- भूसा अलग हो, जन्म- स्थान उपदेश की शैली अलग हो परंतु उपदेश सबका एक ही रहा है-मानव कल्याण! मानव जागृति! मानव उत्थान! इसलिए चाहे पूर्व हो या पश्चिम उत्तर हो या दक्षिण हर तत्ववेता महापुरुष के स्वरों से एक ही गुज सुनाई देती है कि कैसे मनुष्य आत्म- जागृति द्वारा आत्म शांति व आत्म-उन्नति के तरफ कदम बढ़ाए?
*संस्कृत सुभाषितानि*-
*यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवाणि निषेवते।*
*ध्रुवाणि तत्य नश्यन्ति अध्रुवाणि नष्टमेव हि।।*
-जो निश्चित को छोड़कर अनिश्चित का आश्रेय लेते हैं, उनका निश्चित भी नष्ट हो जाता है और अनिश्चित तो नष्ट के समान ही है।
*सहसा विदधीत न क्रियामविवेक: परमापदां पदम्*।
किसी भी कार्य को एकाएक शुरू नहीं करना चाहिए। बिना सोचे समझे कार्य करना बड़ी परेशानी का कारण होता है।
*कबीर दास जी*
*बिना विचारे जो करें सो पाछे पछताय। काम बिगाड़े आपनो जग में होत हंसाय*..
यह दोहा बताता है बिना सोचे समझे किया गया काम बाद में पछतावा देता है। गलत काम करने से व्यक्ति का नुकसान होता है और लोग उसका उपहास करते हैं।
ध्यान रखें वर्तमान स्थिति हमेशा हमारे अनुकूल नहीं हो सकती और उन्हें ठीक करने का कोई जादुई छड़ी भी नहीं हुआ करती। ऐसे में धैर्य के साथ पर्याप्त चिंतन करके ही किसी नतीजे पर पहुंचना चाहिए।
ॐ श्री आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी
