**ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर व्यक्ति ध्यान की सीढ़ी के माध्यम से वास्तविक आनंद को प्राप्त करता है।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।


हर बच्चे का पसंदीदा खेल है- साँप सीढ़ी। केवल बच्चे ही नहीं, यदि समय मिले तो बड़े भी इस पर अपने हाथ आजमा लेते हैं। इसमें जीतने के लिए न तो किसी तरह के अभ्यास की आवश्यकता होती है, न अनुभव की ओर न ही बुद्धिमत्ता की। सब कुछ केवल पासे फेंकने के हुनर और खिलाड़ी के भाग्य पर निर्भर करता है। यदि पासे सही पड़े तो लंबी सीढ़ी चढ़कर सबसे आगे निकल जाता है। अगर पासों पर अंकित अंकों ने साँप के मुख तक पहुंचा दिया, तो खिलाड़ी लुढ़क कर साँप की पूँछ माने निचले पायदान पर पहुंच जाता है।मतलब कि भाग्य और पासों की मार से व्यक्ति जीतते जीतते हार जाता है।कई बार तो लक्ष्य के समीप पहुँचकर वह यात्रा के आरंभिक बिंदु पर आ जाता है।

  वर्षों पूर्व इस खेल की शुरुआत भारत में हो गई थी। भारत भूमि के संत महापुरुष ही इसके जनक थे।

    दरअसल, गाँवों के सहज लोगों को गूढ़ अध्यात्म को सरल तरीके से समझाने के लिए इस खेल की रचना की गई थी। संत ज्ञानदेव जी जनमानस को धर्म, सनातन ज्ञान आदि विषयों से अवगत करवाते थे। क्योंकि कम पढ़े लिखे लोग ग्रंथों शास्त्रों की कठिन भाषा को समझने में असमर्थ थे। संत ज्ञानदेव जी इस खेल में वैदिक सनातन आदर्शों को सम्मिलित किया था।

     जैन मत के अनुयायियों ने इस खेल को नवीन रूप दिया और इसके माध्यम से समाज को जीवन यापन के श्रेष्ठ मार्ग से अवगत करवाया। जनमानस को उत्तम कार्यों और शुभ संकल्पों की ओर प्रेरित किया।

   पुरातन काल का यह खेल 1-100 की श्रृंखला मात्र नहीं था। इसमें आखिरी अंक 100 पर पहुँचने का मतलब था- 'कैलाश'- ईश्वर के परमधाम मे प्रवेश! इस तख्ती पर विभिन्न दोषों व गुणों को अंकित किया गया था।इसमें साँप 'श्राप' तथा सीढ़ी 'वरदान' की प्रतीक थी।अंकों के अनुसार गोटी जिस भी स्थान पर पहुँचती थी, उस खाने में अंकित गुण अथवा दोष के अनुसार ही उसे फल की प्राप्ति होती थी।

   'पाप कर्म करने से मनुष्य महापाताल में आ गिरता है।इसलिए सदा शुभ कर्म ही करने चाहिएं।'

     'हिंसा का दोष व्यक्ति के लिए नरक के द्वार खोल देता है। हिंसा करनेवाला मनुष्य नरकगामी होता है।'

   'आनंदधाम पहुँचने का मार्ग ब्रह्मज्ञान की ध्यान साधना से होकर गुजरता है। कहने का तात्पर्य कि ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर व्यक्ति ध्यान की सीढ़ी के माध्यम से वास्तविक आनंद को प्राप्त करता है।'

  अतः ये सभी पक्ष स्पष्ट करते हैं कि प्राचीन समय में साँप सीढ़ी केवल खेल नहीं था, बल्कि प्यारा सा सत्संग था। इसके द्वारा जनमानस को सीधी सरल शैली में, खेल खेल में अध्यात्म के जटिल विषयों और मार्मिक तथ्यों से अवगत करवा दिया जाता था।सफल जीवन जीने की उत्तम कला सिखा दी जाती थी।

  19वीं शताब्दी में जब यही खेल इंग्लैंड पहुंचा, तो वहाँ पर Snakes & Ladder के नाम से विख्यात हुआ। तब से आज तक यह केवल कोरे अंकों को पार करने का खेल बन कर रह गया है। इसके भीतर से अध्यात्म पूर्णतः लुप्त हो गई हैं। ठीक जैसे भारतीयता से अलग होकर हर पाश्चात्य वस्तु हो जाती है! संस्कारों से विहीन सभ्यता!!

**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**

"श्री रमेश जी"

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