सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
अध्यात्म ज्ञान! ब्रह्मज्ञान!ईश्वर का प्रत्यक्ष दर्शन!ध्यान साधना की शाश्वत विधि!
यही एकमात्र फार्मूला है, जो युग युगांतरों से मानव समाज को लाभ देता आ रहा है। जिस जिसने भी इस युक्ति को अपनाया, उसने समस्त व्याधियों की कारा को तोड़कर मुक्ति का द्वार अवश्य पाया। अपने जीवन में आनंद एवं शांति का अनुभव किया।उपनिषदों का भी उद्घोष है- 'आनंदो ब्रह्मेति व्यजानात्' अर्थात ब्रह्म ही आनंद है।अतः जो ब्रह्मज्ञान के माध्यम से ब्रह्म को जान लेता है, उसका सम्पूर्ण जीवन आनंद स्वरूप ही हो जाता है।
प्रपन्नगीता में कहा गया है--
"नित्योत्सवो भवेत् तेषाम् नित्यश्रीर्नित्य मंगलम।
येषां हृदिस्थो भगवान मंगलायतनं हरि:।।"
अर्थात, जिसने अपने हृदय में हरि का दर्शन कर लिया तथा उनसे सच्ची लौ लगा लिया, उसका तो हर दिन ही उत्सव है। उसके जीवन में सबकुछ आनंद से परिपूर्ण होता है।
विवेकचूड़ामणि मे आदि गुरु शंकराचार्य जी लिखते हैं--
"न गच्छति विना पानं व्याधिरौषधशब्दत:।
विनापरोक्षानुभवं ब्रह्मशब्दैर्न मुच्यते।।"
अर्थात, मात्र औषधि औषधि कहने से रोग को ठीक नहीं किया जा सकता। इसके लिए औषधि का सेवन अनिवार्य है। ठीक इसी प्रकार केवल 'ब्रह्म' कहने से मुक्ति नहीं पाई जा सकती। यह तो ब्रह्म के दर्शन द्वारा ही संभव है।
दरअसल, ब्रह्म पर ध्यान एकाग्र करने पर हमारे भीतर सकारात्मक ऊर्जा व ईश्वरीय शक्ति का संचार होता है। यह ऊर्जा हमें उन नकारात्मक साँचों को बेअसर करने में सक्षम बनाती है।
योगानंद परमहंस जी अपनी पुस्तक 'द डिवाइन रोमांस' मे लिखते हैं-- "जब भी हम ईश्वर में ध्यान लगाते हैं, तो हमारे मस्तिष्क में नए साँचे आकार लेने लगते हैं।ऐसे में ईश्वर से प्रार्थना करते हुए संकल्प लें- मैं अपने मस्तिष्क की कोशिकाओं को आदेश देता हूँ कि वे बदल जाएँ, बुरी आदतों की अपनी सभी रेखाओं को नष्ट कर डालें जिन्होंने मुझे कठपुतली बना रखा है। हे प्रभु, अपने दिव्य प्रकाश से मेरी इन बुराइयों को नष्ट कर दें।
यदि हम भी एक तत्ववेत्ता, ब्रह्मनिष्ठ सदगुरु की शरण पा लेते हैं- जो हमें ब्रह्मज्ञान प्रदान कर ब्रह्म का साक्षात्कार करा दें- तो हम भी वह बन पाएंगे और वह पा जाएंगे- जो हम हो सकते हैं और जिसे हासिल करने के लिए हम संसार में आए हैं।
**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**
"श्री रमेश जी"
