क्रिसमस पर संता नहीं संत बने— योगाचार्य धर्मेंद्र प्रजापति

 

 योगाचार्य धर्मेंद्र प्रजापति जी साथ है विश्व स्वरूपानंद जी

आज के भौतिकतावादी और तनावपूर्ण जीवन में युवा पीढ़ी तेजी से गलत आदतों और भटकाव की ओर बढ़ रही है। इसी संदर्भ में प्रख्यात योगाचार्य धर्मेंद्र प्रजापति ने समाज को एक सार्थक संदेश देते हुए कहा कि “संता नहीं, संत बने” — अर्थात् जीवन को केवल मनोरंजन, आलस्य और नकारात्मक प्रवृत्तियों में न गंवाकर, संयम, अनुशासन और सेवा के मार्ग पर चलना ही सच्चा विकास है योगाचार्य धर्मेंद्र प्रजापति ने कहा कि 25 दिसंबर को केवल क्रिसमस डे के रूप में ही नहीं, बल्कि तुलसी पूजन दिवस के रूप में भी जाना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें अपनी संस्कृति और परंपराओं को कभी नहीं भूलना चाहिए। क्रिसमस ईसाई समुदाय की संस्कृति है, उसका सम्मान होना चाहिए और उन्हें पूरे आदर के साथ मनाने का अधिकार है, लेकिन साथ-साथ हमें अपनी भारतीय संस्कृति की भी रक्षा और सम्मान करना चाहिए। उन्होंने ये भी कहा योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि यह मन, बुद्धि और आत्मा को शुद्ध करने की पूर्ण जीवन पद्धति है। नियमित योग, प्राणायाम और ध्यान से व्यक्ति अपने भीतर छिपी नकारात्मकता को समाप्त कर सकता है और एक संतुलित, सकारात्मक व समाजोपयोगी जीवन जी सकता है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे नशा, आलस्य और दिखावे की संस्कृति से दूर रहकर योग, स्वाध्याय और सेवा को अपनाएं। “जब व्यक्ति स्वयं अनुशासित होता है, तभी वह परिवार और समाज को सही दिशा दे सकता है,” ऐसा उन्होंने कहा। ओम फिटनेस योग संस्थान के माध्यम से विगत कई वर्षों से निःशुल्क योग सेवा दे रहे योगाचार्य धर्मेंद्र प्रजापति का मानना है कि स्वस्थ शरीर और शांत मन ही सशक्त राष्ट्र की नींव है। उनका यह संदेश जन-जन तक पहुँचकर समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाएगा, ऐसी आशा व्यक्त की गई।

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