**दिव्य दृष्टि केवल एक तत्ववेत्ता, ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु के द्वारा ही पाया जा सकता है।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।


ये आंखें सबसे पहले हमें संसार की चकाचौंध दिखाती हैं। उसके बाद हमें उसके प्रति उकसाती है।सांसारिक वस्तुओं को पाने की ललक पैदा कर, हमें माया के चक्रव्यूह में उलझाती चली जाती हैं। हम एक इच्छा से दूसरी, दूसरी से तीसरी पर फिसलते हुए ताउम्र भागते चले जाते हैं। पर क्या इच्छाओं की पूर्ति होने के बाद भी हम खुश हो पाते हैं? नहीं, बल्कि अंत में अपने मनों में और ज्यादा अशान्ति तथा बिखराव महसूस करते हैं।

    फिर शान्ति, संतुष्टि और सकून पाने का उचित मार्ग कौन सा है? वास्तव में, वह मार्ग भी आँख से ही होकर जाता है।... परन्तु इस ऐन्द्रिक आँख से नहीं, बल्कि उस आँख से जो इन इंद्रियों से परे है। उस आंख का दर्शन क्षेत्र यह मायावी संसार नहीं, बल्कि अंतर्जगत है। वह भीतर के अलौकिक नजारों को देखती है। उस आँख को शास्त्र ग्रंथों में 'दिव्य दृष्टि' कहा गया।

   योगानंद परमहंस कहते हैं- इन दो चर्म चक्षुओं के बीच में स्वर्ग का द्वार है।फिर भृकुटि के बीच के स्थान को इंगित करते हुए कहते हैं- जिस शाश्वत आनन्द की तलाश हम जीवन भर करते हैं, उसकी प्राप्ति इसी दरवाजे से होकर मिलती है जहाँ दिव्य चेतना का वास है।

    उपनिषदों में भी कहा गया है- इन दो आंखों के बीचोबीच, माथे पर आनंद का अमृत समाया है। यही ब्रह्म का निवास स्थान है।और इस स्थान पर, जहाँ सचिदानंद विद्यमान हैं, ज्ञानचक्षु के माध्यम से ही पहुंचा जा सकता है।

   महोपनिषद में उपदेष्टा ऋषि कहते हैं- सर्वज्ञ सच्चिदानंद प्रभु को ज्ञानचक्षु से देखा जाता है।जिसके पास ज्ञानचक्षु (दिव्य दृष्टि) नहीं, वह परब्रहम को उसी प्रकार नहीं देख सकता, जैसे कोई अंधा व्यक्ति प्रकाशवान सूर्य को।

    दिव्य दृष्टि केवल एक तत्त्ववेत्ता, ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु के द्वारा ही पाया जा सकता है। पूर्ण सद्गुरु की शरण में गए बिना, मनुष्य कभी सार्थक परिणाम प्राप्त नहीं कर सकता।

**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**

"श्री रमेश जी"

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