सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
आज हर ओर हिंसा का बोल बाला है। हर तरफ वैमनस्य भरा नजारा दिखाई देता है। अपशब्द बोलना तो दूर, एक दूसरे को मारने पीटने तक को उतारू हो जाते हैं। वहीं मीडिया वाले टी वी कार्यक्रमों में नकारात्मकता, क्रूरता, हिंसा ही प्रदर्शित किया करते हैं। यहाँ तक कि बच्चों के कार्यक्रमों में भी मासूमियत, बचपना, नैतिक शिक्षा लुप्त हो चुके हैं। शान्ति और आनंद देने वाला संगीत भी अपनी गरिमा खो चुका है। सभी में क्रूरता, हिंसा, अश्लीलता का ही दर्शन होता है। संगीत मधुर न रहकर शोर बन चुका है।
अतः ये सभी तथ्य सिद्ध करते हैं कि समाज से "अहिंसा परमो धर्म:" की उक्ति लुप्त हो चुका है। इस संदर्भ में विभिन्न संस्कृतियों और विविध महापुरुषों के स्वर भी उभरे। वह मत देखो जो सद्चरित्रता के विरुद्ध है।
वह मत सुनो जो शिष्टता के विपरीत है।
वह मत बोलो, शिष्टाचार विरोधी है।
पर वहीं, भारत की वैदिक संस्कृति केवल यहीं तक सीमित नहीं थी। हमारे ऋषियों ने इससे भी आगे की गूढ़ बात की। वास्तव में, इन्द्रियों पर सहज संयम होना भी आवश्यक है।क्योंकि अगर हमारी इन्द्रियाँ असंयमित और अनियंत्रित हैं, तो नैतिकता के सभी उपदेश विफल हो जाएंगे।
इंद्रियों के आदेश का गुलाम होना ही अनेक समस्याओं को निमंत्रण है।वहीं इंद्रियों पर विजय प्राप्त करना ही सफलता व आनंद का मार्ग है। इसलिए तत्वज्ञानी महापुरुषों ने इंद्रियों को संयमित करने हेतु उससे भी ऊँची सत्ता 'मन' को नियंत्रित करने का संदेश दिया। तत्पश्चात मन से भी श्रेष्ठ 'बुद्धि' और बुद्धि से भी उत्कृष्ट 'आत्मा' को जानने हेतु प्रेरित किया।
श्री मद भगवद्गीता में कहा गया है--
"इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धे परतस्तु स:।।"
अर्थात देह से श्रेष्ठ पाँच इन्द्रियाँ हैं। इन्द्रियों से बढ़कर मन है। मन से उत्कृष्ट बुद्धि है और बुद्धि से श्रेष्ठ आत्मा है।
मतलब कि आत्मा ही सर्वोपरि है। यही कारण है कि तत्वज्ञानी संतों ने आत्मा को जानने पर बल दिया क्योंकि यदि आत्मा जागृत होगी तो बुद्धि आत्मा के, मन बुद्धि के और इन्द्रियाँ मन के नियंत्रण में स्वतः ही हो जाएगी। तब हमारा सम्पूर्ण स्वरूप आत्मा से ही संचालित होगा। आत्मा परमात्मा का अंश है, सकारात्मकता का स्रोत है।
जब हम पूर्ण सद्गुरु द्वारा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करते हैं, तो हमारी सुप्त आत्मा जागृत होती है। इस सम्पूर्ण जगत में ब्रह्मज्ञान के समान कोई और साधन नहीं है, जिसके द्वारा मनुष्य पवित्रता को अपने आचरण में ढाल सके।
सर्व श्री आशुतोष महाराज कहते हैं--
"न शान्ति के गीत हैं, न प्रेम का प्रकाश है।
ब्रह्मज्ञान के बिना विनाश ही विनाश है।।"
**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**
"श्री रमेश जी"
