सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा।
ईश्वर-यह एक ऐसा विषय है, जिसने हमेशा इसे इंसानी बुद्धि में हलचल पैदा की है। बड़े-बड़े तर्कशास्त्री, विद्वान , बुद्धिजीवियों इत्यादि ने इस संबंध में अपना बुद्धि खूब लगाए। पर फिर भी अधिकतर यह विषय एक पहेली बनकर रह जाता है। ईश्वर के नाम पर बाहर से सब कुछ करते हैं। उसकी खोज में, उसके दर्शन के लिए दूर- दराज तीर्थ स्थलों पर जाते हैं। उसको पाने के लिए नदी और सरोवर में डुबकी लगाते हैं। लेकिन बस अपने भीतर ही नहीं झांकते। इसी बात को संत अगस्तीन इन शब्दों में रखते हैं-'मैं ईश्वर की खोज में दर-दर भटका। मैंने उसे शहरों में ढूंढा, गलियों में तलाशा... पर उसे पा नहीं पाया। करण की वह तो मेरे अंदर ही बैठा था... जहां मैंने उसे खोजा ही नहीं। '
समस्त शास्त्र -ग्रंथों का भी एकमेव स्वर में यही कहना है-ईश्वर को बाहर नहीं, अपने भीतर ही पाया जा सकता है। जिस तरह फूलों में सुगंध और दर्पण में हमारी परछाई छिपी हुई है; वैसे ही परमात्मा भी हमारे अंदर ही है। अतः यज्ञादि कर्म तथा मार्गो द्वारा उस शाश्वत की प्राप्ति नहीं हो सकती। ईश्वर को पाने के लिए श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु की शरण में जाना अनिवार्य है।
*धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायाम।*महाजनों येन गत: स पन्था:।।*
अर्थात जिस रास्ते से होकर, ज्ञानीजन गुजरे, उसी मार्ग पर चलकर धर्म के गुह्यतम(अति गोपनीय) तत्व यानि ब्रह्मज्ञान के द्वारा ही ईश्वर को जाना जा सकता है। केवल वही एकमात्र रास्ता है।
ॐ श्री आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी ✍️
