सोचता हूं।

 

कामना से किए गये कर्म पुण्य(अच्छा),पाप(बुरा)और मिश्रित (पुण्य-पाप)तीन तरह के होतेहैं–१-संचित/एकत्रित कृत कर्म– इन कर्मों का फल मिलना अभी बाकी  होता है,   अतः  ये अज्ञात के समान होते हैं, कर्ता इनसे चिंता रहित होता है।

२-प्रारब्धकर्म–ऐसे कृत कर्मों को भोगने के

लिए जाति(अच्छी -बुरी योनियों में जन्म),

एक निश्चित आयु और अच्छे-बुरे कृत

कर्मों के अनुसार अच्छे-बुरे भोग मिलतेहैं।

३-क्रियमाण/किए जाने वाले कर्म-जो कर्म

किये जा रहे हैं, उनमें से जो कुछ कर्मों का फल कर्ता को तुरंत मिल जाता है उसे वह अच्छा -बुरा समझ जाता है, लेकिन जिन कृत कर्मों का फल तुरंत नहीं मिलता , उन्हें कर्ता करके भूल जाता है और उनसे चिंता रहित होकर, पुनः वैसा कर्म करने में वह कर्ता बेख़ौफ़ उत्साहित रहता है ‌।कृत कर्मों का फल उसी तरह समझना चाहिए जैसे किसी श्रमिक का श्रम-फल— दैनिक,साप्ताहिक,मासिक,द्विमासिक आदि।

जैसे आसानी से घी दूध को नहीं छोड़ता 

उसी तरह आसानी से कृत कर्मफल कर्ताको नहीं छोड़ता। किसी ने ठीक ही कहा है –

कृतंकर्मावश्यंभोक्तव्यंशुभाशुभम्।

                 प्रस्तुतकर्ता 

         डांं०हनुमानप्रसादचौबे

                  गोरखपुर।

Post a Comment

Previous Post Next Post