**जहाँ गुरु के चरणों में बैठकर शिष्य अध्यात्म के मार्ग पर बढ़ते हैं, उस स्थान से बढ़कर कोई तीर्थ नहीं है।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।


साधकता बहुत से गुणों का सम्मिश्रण होता है।साधकता विवेक भी मांगती है और समर्पण भी।साधकता का अर्थ आपस में प्रेम भाव से मिलकर रहना भी होता है और आदर्शों को लेकर पक्का होना भी।

   साधकों, एक बार जरा अपना आकलन भी करके देखें। क्या आप अपनी सेवा में ऐसी निष्ठा और पूर्णता के रंग भर पाए हैं?

   बहुत बार साधना में अलौकिक अनुभव देखकर हम समझने लगते हैं कि हमने अध्यात्म में बहुत उन्नति कर ली है। परंतु शिष्य की वास्तविक प्रगति तो उसके गुरु की प्रसन्नता में है। यदि आपके पास अपने सद्गुरु भगवान की प्रसन्नता है, तो समझ लें कि आप सचमुच अलौकिक सम्पदा से मालामाल हैं।

     हमेशा समझदारी भरी चतुराई रखें। सामने वाला आवेश में आकर आपसे अपशब्द कह दे। ऐसे में अपना संयम खोकर कोई गलत कदम उठाने के बजाय अपने समझदारी और चतुराई का परिचय दें।

   अर्थपूर्ण कार्य में विवेकपूर्ण तरीके से समय का सदुपयोग करना ही सच्ची सेवा कहलाती है।यदि ऐसी सेवा न हो, तो उचित स्थान खोजकर साधना में रत हो जाना चाहिए।

    निःसंदेह, सेवा में भावना की बहुत बड़ी भूमिका है।परंतु विवेक भी महत्वपूर्ण है। बिना विवेक के, मनमानी सेवा का कोई लाभ नहीं होता। ऐसे में इधर उधर भटकने की अपेक्षा साधना में बैठ जाना चाहिए। तब वह साधना भी सेवा ही बन जाती है।

समस्त ग्रंथों का उद्घोष है--

"अड़सठ तीरथ गुरुचरण, पदवी होत अखंड।

सहजो ऐसो धाम नहीं, सकल खण्ड ब्रह्माण्ड।।"

   जहाँ गुरु के चरणों में बैठकर शिष्य अध्यात्म के मार्ग पर बढ़ते हैं, ध्यान साधना करते हैं- उस स्थान से बढ़कर कोई तीर्थ, कोई दिव्य स्थान पूरे ब्रह्मांड में नहीं है। जो साधक इस सत्य को समझ लेता है, वह फिर इधर उधर जाता नहीं है। अपना ध्यान इधर उधर के प्रलोभनों में नहीं भटकाता। वह तो ईश्वर का साक्षात्कार कराने वाले अपने दिव्य गुरु के मार्ग का ही अनुसरण करता है।

   सांसारिक माता पिता अपनी संतानों में पक्षपात कर सकते हैं। परंतु आध्यात्मिक गुरु के संदर्भ में यह कतई सम्भव नहीं।सद्गुरु तो प्रेम के सिंधु होते हैं, जिनके पास देने के लिए अनंत है।

**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**

"श्री रमेश जी"

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