सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
समस्त धार्मिक ग्रंथों एवं महापुरुषों का उद्घोष है- दिव्य चक्षु केवल एक ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु के द्वारा ही पाया जा सकता है। अन्य सभी मार्ग केवल भटकाते ही हैं।
गुरुगीता में भगवान शिव स्पष्ट कहते हैं-
"जपस्तपो व्रतं तीर्थं यग्यो दानं तथैव च।
गुरु तत्त्वं अविज्ञाय सर्वं व्यर्थं भवेत प्रिये।।"
अर्थात पूर्ण गुरु की शरण में जाये बिना, मनुष्य कभी सार्थक परिणाम प्राप्त नहीं कर सकता। चाहे वह यज्ञ, उपवास, जप, तप, दान, तीर्थ इत्यादि कोई भी मार्ग क्यों न अपना ले। वह मूर्ख की भांति इधर उधर भटकता रह जाता है।
इसी प्रकार रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं- बड़े भाग्य हैं उनके, जो ऐसे श्री गुरु का आश्रय लेते हैं, जिनसे दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है-
"श्री गुर पद नख मनि गन जोती।
सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती।
दलन मोह तम सो सप्रकासू।
बड़े भाग उर आवइ जासू।।"
इसी दिव्य दृष्टि को देते हुए जगद्गुरु श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा था-
...दिव्यं ददामि ते चक्षु: पश्य मे योगमेश्वरं।
अर्थात हे अर्जुन, अब मैं तुझे वह दिव्य चक्षु देता हूँ, जिससे तू मेरा योग ऐश्वर्य स्वरूप देखेगा।
इसी प्रकार गुप्त द्वार के सम्बंध में गुरवाणी में भी कहा गया है-
"नौ दुआरे परगटु किए दसवा गुपतु रखाया।
गुरुद्वारे लाइ भावनी इकना दसवा दुआरु दिखाया।।"
नौ द्वार तो प्रकट रूप में है। परंतु दसवाँ द्वार अर्थात दिव्य दृष्टि, जो गुप्त है, उसे केवल गुरु ही खोल सकते हैं।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
