श्रीमद् भागवत महापुराण में महर्षि व्यास
नन्दन श्री शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को”भागवत के दस लक्षण “निम्नलिखित
प्रकार सुनाया —.
१-सर्ग–इसे सृष्टि, सृजन, रचना आदि
कहते हैं। भगवान् की प्रेरणासे त्रिगुणों में
क्षोभहोकररुपान्तरहोनेसेपंचभूतों(आकाश,वायु,अग्नि,जलतथापृथ्वी) , पंचविषयों/पंचतन्मात्राएं(शब्द, स्पर्श,रुप,रसतथागंध), पंचज्ञानेंद्रियों (कर्ण,त्वचा, नेत्र, रसना और नासिका), पंचकर्मेंद्रियों(हस्त,पाद,मुख, गुदा और जननेन्द्रिय), अहंकार, बुद्धि और मनकी
उत्पत्ति होती है।
२–विसर्ग–भगवान् केआदिअवतारविराट्
पुरूष से उत्पन्न ब्रह्मा जी केद्वाराजो अनेकप्रकारके चराचर सृष्टियों कीरचना
होती है उसे ‘ विसर्ग’ कहते हैं।
३–स्थान- भगवान् नेनश्वरसृष्टिको एक मर्यादा में स्थिर रखा है,इसे ‘ स्थान’ कहते हैं।
४–पोषण–इसे पोषण करना, पालन करना, बढ़ाना आदि कहते हैं। अपने
द्वारा सुरक्षित सृष्टि में भक्तों के ऊपर
भगवान् की जो कृपा होती है, उसे
‘पोषण’ कहते हैं।
५–ऊति–प्राणियों की वे वासनाएं जो
कर्मकेद्वारा उन्हें जन्म-मरण चक्कर में
डाल देती हैं ‘,ऊति’कहलाती हैं।
६–मन्वन्तर–ंमन्वन्तरों के अधिपति
जो भगवद्भक्ति और प्रजा पालनरुपशुद्ध
धर्मका अनुष्ठान करते हैं, उसे ‘मन्वन्तर ‘
कहते हैं।
७–ईशानुकथा–भगवान् के विभिन्न अवतारोंके और उनके प्रिय भक्तों की
विभिन्न कथाओं से युक्त गाथाएं ‘ईशानुकथा’है।
८–निरोध–योगनिद्रास्थभगवान् में जीव
काअपनीविविध उपाधियों (मनुष्य,पशु,
पक्षी,कीट, वनस्पति आदि) के साथ लीन/समाजाना’ निरोध’है।
९–मुक्ति–अज्ञान/भ्रम/अविद्या/माया कल्पित कर्ता, भोक्ता आदि जड़भावको
छोड़ कर जीवका अपने सहज, असल
स्वरुप में भगवान् में स्थित होना ही ‘मुक्ति’है।
१०–आश्रय–परीक्षित! इस जड़-चेतन जगत् की उत्पत्ति और प्रलय जिस तत्त्व
से होते हैं, वह परमब्रह्म/ परमात्मा ही ‘आश्रय’है।–
द्वितीय स्कंध, अध्याय १०,श्लोक १-९
प्रस्तुतकर्ता
डां.हनुमानप्रसादचौबे
