**जब हम भीतर से गुरु भगवान से जुड़ जाते हैं, तो फिर किसी बाहरी कनेक्शन की जरूरत नहीं रहती।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

दिव्य गुरुदेव से मिलकर हम सबकी खोज पूरी हो जाती है। जब हमारे जीवन में गुरुदेव मिलते हैं तो ऐसा लगता है, जैसे मां मिल गई, पिता मिल गए, भाई बंधु सखा मिल गए। ऐसा लगता है, जैसे साँसों का स्पंदन ही मिल गया।

  पर ध्यान दें.. किसी से 'मिलने' और उसे 'पाने' में बहुत अंतर होता है। एक बार महाराज श्री मुस्कुराते हुए बहुत बड़ी बात कह गए थे-- "साधको, अभी तो हमारी और आपकी सिर्फ भेंट हुई है। अभी तो आपने हमें सिर्फ देखा है, पर आत्मिक रूप से पाया नहीं है। अभी तो बाहरी सम्बंध जुड़ा है। आध्यात्मिक बंधन नहीं बंधा है।"

   यह पाना और आध्यात्मिक बंधन में बँध जाना-- यह सब क्या है और कैसे होता है?

   कहते हैं, महर्षि रमण के एक शिष्य को उनके बाहरी सान्निध्य की बहुत आदत हो गई थी। एक समय महर्षि का थोड़ा स्वास्थ्य बिगड़ गया और उन्होंने अपने शिष्यों से मिलना कम कर दिया। अब यह शिष्य अत्यंत विचलित हुआ। उसने महर्षि रमण के चरणों को पकड़कर बोला, मुझे आपकी आदत हो गई है। मेरी प्यास आज भी बरकरार है।

महर्षि रमण - वह प्यास ऐसे बुझने भी नहीं वाली।

शिष्य- क्यों आचार्य?

महर्षि रमण- क्योंकि मैं अनंत हूँ। इस अनंत को बस यूँ बाहर से पास बैठकर नहीं पाया जा सकता।

   कहते हैं महर्षि रमण ने हाथ उठाकर एक दिव्य संकेत किया। अँगुली को पहले अपनी ओर किया, फिर अपने शिष्य के हृदय को छुआ। फिर अँगुली शिष्य की ओर की.. और उसे घुमाकर अपने हृदय पर लगा लिया। महर्षि रमण ने संकेतों में अपने शिष्य को समझाया- 'मैं तेरे हृदय में रहता हूँ और तू मेरे हृदय में रहता है।.. इसका तू अनुभव कर।

    साधकों, गुरु महाराज जी के बाहरी दर्शन करना, महाराज जी के चरणों में बैठना ही महाराज जी को पाना नहीं है। बल्कि महाराज जी के श्री चरण हमें हमारे हृदय में अनुभव हों। महाराज जी की अनुभूति हमारे भीतर जागृत हो जाए-- यह है गुरु को पाना।

   अंततः, जब हम भीतर से गुरु महाराज जी से जुड़ जाते हैं, तो फिर किसी बाहरी कनेक्शन की जरूरत नहीं रहती। हर श्वास में महाराज जी से अंदर ही अंदर बातें होती हैं।महाराज जी का दिव्य सान्निध्य भरपूर रूप से सदा भीतर समाया रहता है। वास्तव में यही है, अपने सदगुरु को पाना।

**ओम् श्री आशुतोषाय नमः*

"श्री रमेश जी"

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