सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
मंदोदरी ने कोई उत्तर नहीं दिया पर पीछे खड़ी सूर्पनखा बोल पड़ी, "तुम क्षमा के योग्य नहीं हो विभीषण! तुमने समस्त कुल का नाश कर दिया। राज्य के लोभ में तुम इतने अंधे हो जावोगे, यह हमने सोचा भी नहीं था...।"
विभीषण सचमुच पीड़ा में थे, उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। लेकिन मंदोदरी से सहन नहीं हुआ। वह गरज कर बोली- लंका का नाश विभीषण ने नहीं, तुमने किया है सूर्पनखा! व्यक्ति यदि अपनी उच्छऋंखलता को ही स्वतंत्रता मान ले तो वह अपने साथ साथ पूरे समाज का नाश कर देता है। तुमने वही किया। यदि तुमने सीता के सुन्दर आंगन में अपनी नाक न फँसाई होती, तो आज तुम्हारा जगत विजेता भाई भूमि पर नहीं लेटा होता।
अपराधी प्रवृत्ति का व्यक्ति अपने कुकर्मों की चर्चा पर अत्यंत तीव्र प्रतिक्रिया देता है। सूर्पनखा ने बिदकते हुए कहा- मैंने क्या गलत किया महारानी? क्या एक स्वतंत्र जीवन की मांग करना गलत है? क्या अपने स्वाभिमान, अपने अधिकारों के लिए लड़ना गलत है? मैंने कुछ गलत नहीं किया।
"स्वतंत्रता? व्यक्ति की स्वतंत्रता जब समाज की स्वतंत्रता का अतिक्रमण करने लगे तो वह अपराध हो जाती है सूर्पनखा। तुम्हारा स्वाभिमान यदि दूसरों के लिए दुख का कारण है तो धिक्कार है तुम्हारे स्वाभिमान को। उसे कुछ और नाम दो। हम इस धरती के इकलौते नागरिक नहीं हैं, यहाँ अन्य करोड़ों लोग निवास करते हैं। अपने लिए सुख तलाश करते समय यदि हम दूसरों के सुख दुख का ध्यान नहीं रखेंगे तो हमारा एक दिन समूल नाश अवश्य ही होगा। तुम्हें सत्ता का संरक्षण प्राप्त था तो तुमने अपने असभ्य आचरण को अधिकारों की सीमा में शामिल कर लिया, पर यह गलत ही था। इतिहास तुम्हें सदैव एक उदण्ड और चरित्रहीन स्त्री के रूप में ही याद रखेगा जिसने अपने उत्पात के कारण अपने भरे पूरे वंश का सत्यानाश कर दिया।" मंदोदरी के स्वर में कठोरता नहीं थी, दुख था।
सूर्पनखा ने अपने चरित्र के अनुरूप ही उदण्ड स्वर में कहा, "जो मैंने किया वही तो तुम्हारे पति और पुत्र भी करते रहे थे महारानी! पर तुम उनकी चर्चा क्यों नहीं कर रही? क्या केवल स्त्री होने के कारण ही मैं अपराधी ठहरा दी गयी हूँ?"
"वे पुरुष थे, इसीलिए रणभूमि की धूल में लोट गए। तुम स्त्री थी, इसलिए बच गयी हो। वे अपने कुकर्मों का दंड पा चुके हैं, तुम अभी अनन्त कुकर्मों के लिए स्वतंत्र हो। सो स्त्री होने का रोना न रोवो सूर्पनखा! इसी परिवार में मेरी पुत्रवधु सुलोचना जैसी स्त्रियां भी हैं जिनके आगे शत्रुदल भी श्रद्धा से नतमस्तक है।" कहते कहते एक बार फिर मंदोदरी पीड़ा से फफक पड़ी थीं। अपने समस्त पुत्रों को खोने की आग उस साध्वी का हृदय जला रही थी। सूर्पनखा को न मानना था, न मानी। वह पैर पटकते हुए वहाँ से चली गयी।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
