सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
एक मन , जिसे हम (Conscious mind) कहते हैं। दूसरा होता है अवचेतन मन (Subconscious mind) यानी वह मन, जो नींद में स्वप्न जगत का निर्माण करता है। जैसे जब मनुष्य पर तंद्रा छाती है, तो मन एक भ्रमात्मक स्वप्न जगत की रचना कर डालती है। एक ऐसा जगत, जो मनुष्य को सच जान पड़ता है। इतना कि उसके अनुभवों के साथ मनुष्य स्वप्न में रोता भी है व्यथित भी होता है; यहां तक की आग में कूद कर अपनी जान दे रहा है।पर जैसे तंद्रा टूटती है और मनुष्य जागृत अवस्था में आता है, तब उसे सुधि आती है कि वह सारा मन से बना हुआ एक काल्पनिक स्वप्न जगत था। यथार्थ नहीं था।
ठीक ऐसे ही, नींद से जगने पर हम समझ पाते हैं कि जो हम स्वप्न में देख रहे थे, वो सत्य नहीं था, हमारे मन की कल्पनाओं का तना- बना था। जैसे हमारा अवचेतन मन हमें स्वप्न जगत में भरमाता है, वैसे ही हमारा चेतन मन इस जगत में भरमाता है।
परंतु जब जीवन में एक पूर्ण तत्वदर्शी गुरु आते हैं, वे हमें स्वप्न से (जो हम जागृत अवस्था में चेतन मन के द्वारा देखते हैं) जागने की युक्ति देते हैं। तब हमें पता चलता है कि यह जगत जिसे हम सत्य मानते रहे, यह भी वास्तव में मिथ्या और भ्रम है। तब फिर हमें यहां होने वाले सुख-दुख व्यापते नहीं। हमें विचलित नहीं करते। तभी गीता में श्री कृष्ण कहते हैं
*या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी*(२/६९)
जो समस्त संसारी जीवो के लिए रात है, जिसमें काल्पनिक स्वप्न देखते हैं; वही जागृत साधकों के लिए दिन जैसा है, जिसमें वास्तविक तत्व से, सत्य से जुड़े रहते हैं।
ॐ श्री आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी✍️
