श्रीमद् भागवत महापुराण में श्री शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को सुनाया कि श्री मैत्रेय जी ने विदुर जी से कहा –विदुर!
सृष्टि करने वाले सत्य संकल्प भगवान् श्रीहरि ही ब्रह्मा के रुपमें प्रत्येक कल्प के
आदि में रजोगुणी होकर स्वयं ही जगत् के रुप में लूता/मकड़ी -जालकेसमान
अपनी ही रचना करते हैं।
विदुर जी! प्राकृत -वैकृत दस प्रकार की सृष्टि सुनो–
१-महत्तत्त्वकीसृष्टि–भगवान् की प्रेरणा से
सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण में विषमता।
२-अहंता/अहंकार की सृष्टि।
३–पंचविषय/पंचतन्मात्राओं की सृष्टि।
४–दसेंद्रियों की सृष्टि।
५–दसेंद्रियों केदस अधिष्ठाता देवताओंकी
सृष्टि।
६–अविद्या की सृष्टि -इसमें तामिस्र,अंध
तामिस्र,तम,मोह और महामोह-ए पांच
गांठें हैं जो प्राणियों/जीवों की बुद्धि का
आवरण/पर्दा हैं। ये१से ६ प्राकृत सृष्टियां हैं।
७–वैकृतसृष्टि/स्थावरपादपसृष्टि–ये छह
प्रकार की हैं–१-वनस्पति–गूलर,पीपलादि
२-ओषधि–़धान, गेहूं,चना आदि
३-लता-ब्राह्मी,गिलोय आदि।
४-त्वक्सार/कठोर छालवालेवृक्ष–
बांस आदि।
५–वीरुध–जैसेखरबूजा,तरबूजादि
६–द्रुम–जैसे आम,जामुन आदि।
८–तिर्यक्योनियों/पशु-पक्षियों की सृष्टि ।
९-मनुष्ययोनि की सृष्टि। और
१०–देवसृष्टि-यहसृष्टि आठतरह कीहै–
१-देवता२-पितर३-असुर४-गंधर्व-
अप्सरा५-यक्ष-राक्षस६-सिद्ध-चारण
–विद्याधर ७-भूत-प्रेत–पिशाच
तथा ८–किंनर-किंपुरुष-अश्वमुख ।
स्कंध ३,अध्याय१०,श्लोक१४-२९
प्रस्तुतकर्ता
डां०हनुमानप्रसादचौबे
गोरखपुर।
