सोचता हूं ।

 

श्रीमद् भागवत महापुराण में श्री शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को सुनाया कि श्री मैत्रेय जी ने विदुर जरी!

सृष्टि करने वाले सत्य संकल्प भगवान् श्रीहरि ही ब्रह्मा के रुपमें प्रत्येक कल्प के 

आदि में रजोगुणी होकर स्वयं ही जगत् के रुप में लूता/मकड़ी -जालकेसमान

अपनी ही रचना करते हैं। भगवान् काल रुप से इस संसार में सूक्ष्मतम से महत्तम

रुप में व्याप्त है जैसे –काल प्रपंच की 

परमाणु जैसी सूक्ष्मावस्था में व्याप्त रहता है ,वह अत्यंत सूक्ष्म है जो सृष्टि से लेकर 

प्रलय तक उसकी सभी अवस्थाओं का

भोग करता है, वह परम महान् है।

     दो परमाणु=एक अणु

     तीन अणु=एक त्रसरेणु 

      तीन त्रसरेणु=एक त्रुटि

       सौ त्रुटि=एक वेध

       तीन वेध=एक लव

       तीन लव=एक निमेष

        तीन निमेष=एक क्षण 

        पांच क्षण=एक काष्ठा

        पंद्रह काष्ठा=एक लघु 

       पंद्रह लघु=एक दंड/नाडिका

        दो दंड/नाडिका=एक मुहूर्त 

        तीन मुहूर्त=एक प्रहर/याम 

       एक प्रहर/याम=तीन घंटे 

     एक घंटा=एकहोरा/2.30घटी

      एकमिनट=एकविहोरा/2.30पल

     एकसेकंड=एकप्रतिहोरा/2.30विपल

      आठ प्रहर = चौबीस घंटे=एकवार

    एकवार= एक दिन और एक रात 

        सातवार=एक सप्ताह 

   चार सप्ताह=तीस दिन=एक माह

     बारहमाह=एक वर्ष/संवत्सर/परि

वत्सर/इडावत्सर/अनुवत्सर/वत्सर

एक मानव वर्ष/बारहमास =एक देवदिन

एकदेववर्ष=360मानववर्ष

432000मानववर्ष=एककलियुग=1200

देव वर्ष ।

इससेदुगुनेवर्ष=एकद्वापरयुग=2400

देव वर्ष।

इससे तिगुने वर्ष=एकत्रेतायुग=3600

देव वर्ष। तथा 

इससे चौगुनेवर्ष=एक सत्ययुग=4800

देववर्ष।

चार युग=एक महायुग 

1000महायुग=एक कल्प 

 एककल्प=14मन्वंतर

एकमनु=71महायुग

एक कल्प=ब्रह्मा का एकदिन(सृष्टि)/एक

रात्रि (प्रलय)

ब्रह्मा की पूरी आयु=100देववर्ष=

दो परार्ध।

                प्रस्तुतकर्ता 

         डां0हनुमानप्रसादचौबे

                 गोरखपुर।



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