सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
शिवमहापुराण की उमासंहिता में देवी पार्वती कहती हैं- "हे महादेव!सम्पूर्ण संसार, देवता, गंधर्व, मानव आदि काल के अधीन हैं। सकल जगत का बल, शक्ति व ऐश्वर्य काल के गाल में समाता है। एक बार आपने उसी काल को परास्त किया था। तब उसने आपके समक्ष प्रार्थना कर पुनः अपनी प्रकृति को प्राप्त किया था। वह सम्पूर्ण जगत में विचरण करता है।परंतु उसे देखने में कोई सक्षम नहीं। हे नाथ! क्या इस काल को नष्ट करना सम्भव है? यदि है, तो मैं आपसे आग्रह करती हूं कि आप इस काल को विजित करने का मार्ग बताएं।"
भगवान शिव-- हे पार्वती!देवी देवता, दैत्य, राक्षस, गंधर्व, किन्नर, मनुष्य आदि किसी के द्वारा भी काल का नाश संभव नहीं है। परंतु एक ध्यान परायण योगी शरीर धारी होने पर भी सहजता से काल को नष्ट करने में सक्षम है। इसलिए (ब्रह्मज्ञान प्राप्त) योगी को स्थिर व दृढ़निश्चयी होकर योग साधना का अभ्यास करना चाहिए। जो साधक शुभ भावों से अभ्यास करता है, वह शब्दब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है। वह काल व काम को विजित कर संसार में मुक्त हो विचरण करता है।
देवी पार्वती-- हे भगवन! संसारी मानव तो काल के अधीन होकर इस मार्ग की ओर नहीं बढ़ पाते। परंतु इस मार्ग पर चलते हुए एक योगी के समक्ष कौन कौन सी बाधाएं आती हैं?
भगवान शिव-- साधना मार्ग में निद्रा और आलस्य बहुत बड़ा विघ्न है। परंतु योग में स्थित साधक आलस्य व निद्रा का त्याग कर अभ्यास द्वारा अपनी प्राणशक्ति में वृद्धि करता है। तब उसका शरीर रूपी स्तम्भ काल को जीतने वाला हो जाता है।
**ओम् श्री आशुतोषाय नमः **
"श्री रमेश जी"
