सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
आप कभी बत्तखों के झुंड पर रात के समय में गौर करिएगा। आप हैरान रह जाएंगे... क्योंकि सोते समय झुंड के किनारों में खड़ी बत्तखें एक ही आंख बंद करती हैं। इनकी दूसरी आंख अपने आस पास की पहरेदारी करने के लिये खुली रहती है। वैज्ञानिकों के शोध तो यहाँ तक बताते हैं कि उस समय इनकी केवल आँख ही नहीं खुली होती। बल्कि दिमाग का एक हिस्सा भी जागृत होता है ताकि किसी भी खतरे की स्थिति में सुरक्षा हेतु तुरंत उचित कदम उठाए जा सके।
इस तथ्य में हम साधकों के लिए प्रेरणा स्पष्ट है।साधकता की तो डगर ही तलवार की धार पर चलने के समान है- जिसपर संभलकर और सतर्क होकर ही चला जा सकता है। कारण कि आंतरिक विषय विकार हर पल ताक में बैठे रहते हैं- हम पर वार करने के लिए। ऐसे में, क्षण भर भी लापरवाही घातक परिणाम को अंजाम दे सकती है। इसलिए बत्तखों की इस खूबी को हमें तुरंत अपना लेना चाहिए। गीता (2/69) में भगवान श्री कृष्ण भी तो हमें यही साधक सूत्र बताते हैं- "या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी" - जब सब सोते हैं, उस समय पर भी एक योगी साधक जागृत रहता है। बाह्य रात्रि के साथ, इस सूत्र को जीवन के हर उस क्षण में भी लागू करना चाहिए, जिसमें दुख, मुश्किलों इत्यादि का अंधकार छाया हो।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
