भले लोग अपनी करनी के अनुसार सुंदर सम्पत्ति पाते हैं -अमृत।बुरे लोग अपनी
करनी के अनुसार कलियुग के पापों की
नदी कर्मनाशा केसमान विषसंचित
करते हैं।इन दोनों के गुण और दोष तो
सर्व विदित है। सभी लोग जानते हैं। लेकिन जिसे जो भाता/अच्छा लगता है,
उसे वही अच्छा लगता है , वहवही
अपनाता है।भला से भलाई और बुरा से
बुराई ही होती है। अमृत की सराहना
अमरता में और विष की सराहना मरने
में है। महात्मा तुलसी दास जी ने अपने महाकाव्य‘रामचरितमानस’मेंठीकहीकहाहैकिअच्छे और बुरे सभी ब्रह्माजी ने ही
पैदा किए हैं , लेकिन गुणावगुण विचार
कर वेदों ने उन्हें अलग-अलग कर दिया है।वेद, इतिहास और पुराण कहते हैं कि
ब्रह्मा जी की यह सृष्टि गुण तथा अवगुण
सेसनीहुई/मिलीहुईहै– भलेउपोचसबबिधिउपजाए। गनिगुनदोसवेदबिलगाए ।।
कहतिवेद इतिहास पुराना।
विधि प्रपंचुगुन अवगुनसाना।।-बालकांड
प्रस्तुतकर्ता
डा०हनुमानप्रसादचौबे
गोरखपुर।
