सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
शास्त्र ग्रन्थों के अनुसार ईश्वर का सांचा नाम (सूक्ष्मतम श्वास) यह आदिनाम की तरंग सुषुम्ना नाम की सूक्ष्म नाड़ी मे प्रवाहित होती है।
*सुषुम्नैव परं तीर्थम् सुषुम्नैव परोजप:।*
*सुषुम्नैव परं ध्यानं सुषुम्नैव परा गति:।।*
अर्थात सुषुम्ना से बढ़कर कोई तीर्थ नहीं है। न ही कोई जप ध्यान इससे श्रेष्ठ है। केवल और केवल सुषुम्ना ही मुक्ति का मार्ग है। एक जागृत संत (सद्गुरु) वह तरीका (ब्रह्मज्ञान की दीक्षा) प्रदान करते है। परंतु जब हम इस सृष्टि की सबसे प्रबल एवं शक्तिशाली तरंग आदिनाम से जुड़ते हैं, तब? तब हमारे पूर्व जन्म के संस्कारों की पकड़ ढीली पड़ने लगती है। अभ्यास करते-करते एक समय आता है, जब हम निरंतर आदिनाम के साथ जुड़े रहना सीख जाते हैं। ऐसे में संस्कार हमारे करण शरीर से उखड़कर पृथक हो जाते हैं। करण शरीर के स्तर पर कर्म संस्कारों के रूप में बंधन का कोई कारण ही नहीं बचता और हम स्वत: ही मुक्ति के मार्ग पर प्रशस्त हो जाते हैं। इसलिए कबीर दास जी ने कहा
*नाम रतन सो पाइहिं, ज्ञान दृष्टि जेहि होय।*
*ज्ञान बिना नहिं पावई , कोटी करे जो कोय।।*
यह आदि नाम केवल गुरु कृपा से ज्ञान दृष्टि (अर्थात दिव्य चक्षु) के खुलने पर प्रकट होता है। अन्यथा आप करोड़ों तरीका अपना ले, माला फेरले, पोथी पढ़ ले, तीर्थ धाम कर ले, इसे अनुभव कर पाना असंभव है। एक पूर्ण सद्गुरु के द्वारा उस ब्रह्मज्ञान को पाएं और इस अनुभव को प्राप्त करें। महापुरुषों का कहना है-'यही मनुष्य के जीवन की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि है'।
ॐ श्री आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी
