सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
अखबार में एक खबर आई थी। 15 साल के दो बच्चों ने 'Walkie-Mobi-Charger' नाम का एक यन्त्र आविष्कृत किया है। इस खोज का उद्देश्य था कि अगर कहीं हमें विद्युत की सप्लाई न मिले, तब भी हमारा सम्बन्ध बाहरी परिवेश से न टूटे; हमारा मोबाइल चालू रहे।
सज्जनों, सोचने की बात है, हमें बाहरी दुनिया से जुड़े रहने की कितनी चिंता है।परन्तु कमाल है कि अपने भीतर की दिव्यता से जुड़ने की हमें कोई चिंता ही नहीं!! उस परम सत्ता से संबंध कैसे जुड़ेगा- इसके बारे में हमारी कोई सोच नहीं। क्या भक्ति पथ का भी कोई चार्जिंग यंत्र है? इस पर भी तो चिंतन होना चाहिए।
आज के वैज्ञानिक वंशानु संपादन- 'जीन्स एडिटिंग' कर रहे हैं, जिससे बेहतर और मनचाही मानव नस्लों का निर्माण हो सके। हम शिशु की आंखें कैसी चाहते हैं, त्वचा का रंग कैसा चाहते हैं, बुद्धि तार्किक चाहते हैं या रचनात्मक? इस दिशा में भरसक प्रयास, समय और धनराशि लगाई जा रही है। हालांकि कई विरोधी स्वर और संशय इस आविष्कार के साथ उठ रहे हैं। इस प्राकृतिक छेड़छाड़ से कहीं असंतुलन की स्थिति तो नहीं पैदा होगी?
इन्हीं के बीच एक ज्वलंत प्रश्न यह भी है कि यदि यह आविष्कार सिद्ध हो भी गया, तो क्या इससे हमारी और इस समाज की वर्तमान समस्याओं का समाधान मिल सकेगा?विचार कीजिए! सच्चाई यह है कि आज के मानव समाज को जीन्स एडिटिंग से अधिक 'विचार एडिटिंग' की आवश्यकता है। अपने मन में भरी अशुद्धियों का संशोधन करने की ज्यादा जरूरत है। मानव मन की विलासिता और वासनात्मक दृष्टिकोण, दुर्भावना और स्वार्थ पूर्ण सोच- इन सबका संपादन करना बहुत जरूरी है। आज हमारे लिए मानव नस्ल का नव निर्माण नहीं, बल्कि मानव मन का नव निर्माण अधिक महत्वपूर्ण है।
गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी इन्हीं आध्यात्मिक आविष्कारों की साधना में पिछले चार दशकों से रत हैं। आपके द्वारा प्रदत्त ब्रह्मज्ञान की ध्यान साधना से जन जन उस परम चेतना से जुड़ रहा है। गुरुदेव ब्रह्मज्ञान की दीक्षा देते समय ही त्रिकुटी पर प्रकाश का दर्शन कराते हैं। इस दिव्य प्रकाश पर सतत ध्यान लगाने से मन की नकारात्मकताओं की अपने आप एडिटिंग होने लगती है। विकारों का निराकरण और त्रुटियों का संशोधन हो जाता है। श्रेष्ठ व्यक्तित्व का निर्माण होता है।
निःसंदेह, आज इसी आध्यात्मिक आविष्कार और चमत्कार की समाज को ज़रूरत है।
**ओम् श्री आशुतोषाय नमः*
