श्री मद्भगवतगीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा -अर्जुन! तत्त्व ज्ञानियों से प्राप्त ज्ञानसे तू मोहित नहीं होगा और सभी प्राणियों को पूरीतरहसे पहले अपने में फिर मुझ भगवान् में देखेगा। अर्जुन!
यदि तू सबसे बड़ा पापी हो,तोभी ज्ञानरुप
नाव से नि:संदेह समस्त पाप-सागर से
अच्छी तरह पार हो जायेगा, क्योंकि हे
पार्थ! जिसतरह जलता हुआ अग्नि ईंधन/
जलौनी को जला कर राखकरदेताहै,उसी
तरह ज्ञान रुप अग्नि सम्पूर्ण अच्छे-बुरे-
मिश्रित कर्मों कोभस्ममय कर देता है,
निष्क्रिय कर देता है। अर्जुन! इस संसार में ज्ञान केसमान पवित्र/निष्पापकरनेवाला
कुछ भी नहीं है।उस ज्ञानको बहुत समय
से कर्मयोग/असंगनिष्कामकर्म से पवित्र
अंत:करण वाला मनुष्य अपने आपही
आत्मा/अपने में पा लेता है । तथा उस
ज्ञान को प्राप्त कर अविलंब/तत्काल
भगवत्प्राप्तिरुप परम शांति को प्राप्त हो जाता है –
न हि ज्ञानेनसदृशंपवित्रमिहविद्यते।
तत्स्वयंयोगसंसिद्ध:कालेनात्मनिविंदति।।
श्रद्धावान्लभतेज्ञानंतत्पर:संयतेंद्रिय।
ज्ञानंलब्ध्वापरांशांतिमचिरेणाधिगच्छति।।–अध्याय४,श्लोक३८-३९
प्रस्तुतकर्ता
डां०हनुमानप्रसादचौबे
गोरखपुर ।
