सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
"बस यही एक मसला आज भी हल न हुआ।
यूँ तो सुबह शाम जीता रहा,
पर जीना आज भी मुकम्मल न हुआ।।"
क्या यही भाव आपके, हमारे, हम सभी के नहीं हैं?कहने को तो हम सभी दिन रात दौड़ रहे हैं, जीवन जीने के लिए... पर क्या सच में हम जी रहे हैं?
हमारे विद्यालय व महाविद्यालय, छात्रों के समक्ष केवल अपरा विद्या (भौतिक विषय संबंधी जानकारी) के विकल्पों को रखते हैं। यह विद्या उन्हें अच्छे वेतन वाली नौकरी प्रदान कर सांसारिक सुख दे सकती है। लेकिन अफसोस! मन की शांति और आत्मिक आनंद इस विद्या से प्राप्त नहीं किया जा सकता। यदि वे उसके अभिलाषी हैं, तो उन्हें उस विद्या को चुनने का भी विकल्प दिया जाना चाहिए, जिसके द्वारा शान्ति व आनंद को पाया जा सकता है।वह है-- परा विद्या।
कहने का भाव कि जीवन के एक पड़ाव पर हर व्यक्ति के सामने 'अध्यात्म' को चयन करने का विकल्प रखा जाना चाहिए। उसके सामने यह प्रश्न आना चाहिए-- "क्या आप ईश्वर को देखना चाहते हैं?" ऐसा होने पर बहुत संभावना है कि लोग प्रयोगात्मक अध्यात्म का चयन करेंगे।ईश्वर साक्षात्कार की ओर अग्रसर होंगे।
जब हम पूर्ण गुरु की कृपा से ब्रह्मज्ञान में दीक्षित होने पर ईश्वर का साक्षात्कार करते हैं, तो हमारा जीवन अपने लक्ष्य को पाता है।शान्ति और आनंद का हम अनुभव करते हैं।
**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**
"श्री रमेश जी"
