भगवान शंकर ने विवाह के समय जो श्रृंगार किया वह अद्भुत था, - सुश्री श्यामा भारती जी।

 

                साध्वी सुश्री श्यामा भारती जी ,

              श्रद्धालुओं को संबोधित करती हुईं।

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान एवं शिव मंदिर ठाकुरद्वारा समिति पथरहट  द्वारा दिनांक 5 जनवरी से 11 जनवरी तक, शाम 4:00 बजे से रात्रि 8:00 बजे तक,शिव मंदिर ठाकुरद्वारा, ग्राम पथरहट, जिला देवरिया में सप्त दिवसीय श्री रामकथा का आयोजन किया जा रहा है, जिसका आज प्रथम दिवस था. संस्थान के संस्थापक एवं संचालक श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्यों एवं शिष्याओं ने भावमय एवं संगीतबद्ध ढंग से इस कथा को प्रस्तुत किया. 

             कथा के प्रथम दिवस में आज श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या श्यामा भारती ने गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में से भगवान शंकर एवं माँ पार्वती के विवाह के पवन प्रसंग को प्रस्तुत किया. उन्होंने बताया कि भगवान शंकर ने विवाह के समय जो श्रृंगार किया वह अद्भुत था. उनहोंने शीश की उलझी हुई जटाओं को ही संवार कर अपने जीवन का श्रृंगार बना लिया, सर्पों के आभूषण पहने, तन पर भस्म धारण की,नंदी को वाहन के रूप में अपनाया, त्रिशूल को धारण किया इत्यादि. यह श्रृंगार मात्र अद्भुत ही नहीं रहस्यपूर्ण भी है. भगवान शंकर इस श्रृंगार के माध्यम से जीव मात्र को जीवन के सत्यों से अवगत करा देने चाहते हैं. 

              भगवान शंकर द्वारा जटाओं को श्रृंगार का अंग बना लेने से अभिप्राय है कि जीवन की उलझनों में जब जीव प्रभु के चरणों में समर्पित हो जाता है तो यही उलझनें जीवन का श्रृंगार हो जाती हैं. सोने चांदी के स्थान पर सर्पों के आभूषण धारण करने से अभिप्राय है की स्वर्ण की आसक्ति काल की भांति घातक है. भस्म धारण करते हैं तो समझाना चाहते हैं – ‘भस्मान्तम शरीरं’ अर्थात यह तन एक दिन भस्म हो जाएगा. अत: हे मानव, इस तन पर गर्व न कर. इस देह के भीतर प्राणों के रहते इस जीवन के लक्ष्य से परिचित हो जा. 

             मात्र इतना ही नहीं, शिव विवाह सम्पूर्णतया प्रतीतात्मक है. पार्वती जी प्रतीक हैं जीव की और भगवान शिव ईश्वर है. और गुरु की कृपा से ही जीव ईश्वर मिलन संभव हो सकता है। 

कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंत्र उच्चारण एवं व्यास पूजन से किया गया एवं कार्यक्रम का समापन मंगल आरती के माध्यम से किया गया। कार्यक्रम के मुख्य यजमान श्री राकेश सिंह जी श्री शंभू सिंह जी ने व्यास पूजन किया।

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