सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
वास्तव में, इस सृष्टि का अद्भुत रहस्य है- *'जो ब्राह्मण्डे सोई पिंण्डे'* अर्थात जो खगोलीय क्रम बाहरी ब्रह्मांड में है, वही हमारे शरीर के भीतर अंतर्जगत में भी है। हृदय से हमारे सिर की ओर का भाग 'उत्तर 'और पांव की ओर का भाग 'दक्षिण' को संबोधित करता है। योगिक भाषा में कहें, तो 'अनाहत चक्र 'से ऊपर 'सहस्रार चक्र 'तक का भाग 'उत्तरायण पथ' कहलाता है। इसके विपरीत 'अनाहत चक्र' से नीचे 'मूलाधार चक्र' तक का भाग 'दक्षिणायन' पथ कहलाता है। उपनिषदों में ब्रह्मरंध्र (सहस्रार चक्र) को 'ब्रह्मलोक' कहां गया है। इस हृदय मंदिर में सूक्ष्म हृदयाकाश है। इस हृदय आकाश के भीतर जो ब्रह्म छिपा है, उसे खोजना चाहिए, उसे जानना चाहिए।
प्रश्नोपनिषद(3/8) मैं ऋषि कहते हैं- *'आदित्यो ह वै बाह्य: प्राण उदयत्येष*' ..।इसका तात्पर्य है की जो बाह्य जगत में सूर्य है, वह अंतर्जगत में 'प्राण 'है। प्राण ही आदित्य रूप होकर उदय होता है। अतः जैसे बाह्य सृष्टि में सूर्य उत्तरायण व दक्षिणायन पथ पर आता- जाता दिखाई देता है, इस प्रकार हमारे भीतर सूक्ष्म जगत में प्राण भी गति करता है। जिनका प्राण नीचे (मूलाधार चक्र) की ओर अधोगामी है, वह मनुष्य 'दक्षिणायन' या 'पितृयाण पथ' पर चलरहा है। जिनका प्राण ऊपर (सहस्रार चक्र) की ओर ऊर्ध्वगामी है, वह योगी 'उत्तरायण' या 'देवयान' पथ का अनुगामी है।
अतः स्पष्ट है, केवल पूर्ण गुरु और उनके द्वारा प्रदत पूर्ण ब्रह्मज्ञान ही हमें 'दक्षिणायन 'से 'उत्तरायण' पथ का गामी बनता है। दिव्य ज्योति जागृती संस्थान भी कई दशकों से रूढ़िवादी मान्यताओं से अलग जागृति की अलख जग रहा है। आपके हृदय द्वार पर दस्तक देकर आपका आह्वान कर रहा है। "ईश्वर को मानने तक सीमित न रहो ईश्वर का ब्रह्मज्ञान द्वारा अंतर जगत में दर्शन करो।"
'ॐ श्री आशुतोषाय नमः '
श्री सियाबिहारी जी ✍️
