सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
साधन को ही साध्य समझ लेने की भूल नहीं करनी चाहिए। ध्यान का लक्ष्य है ईश्वर- प्राप्ति और ईश्वर प्रेम। ध्यान योग हर योग से बढ़कर है। योगासन प्राणायाम का अभ्यास करने से स्थूल शरीर हवा में उठता है। पर ध्यान योग करने से चेतना ऊपर उठती है।
योग, प्राणायाम, ऋद्धि सिद्धि को ही सब कुछ मान लेना बहुत बड़ा भ्रम है। ये शक्तियाँ एक मनुष्य को प्राप्त हो भी जाएँ, तो भी इनसे जीवन का कल्याण संभव नहीं है। आत्मा तो मात्र ईश्वर दर्शन से ही शांति को प्राप्त करती है। इसलिए ऐसे गुरु की खोज करें, जो आपको ईश्वर का दर्शन करा दें। फिर तो ये सारी ऋद्धि सिद्धियां आपके बाएँ हाथ का खेल हो जाएंगी। और हो सकता है कि भविष्य में आपको कभी इनकी आवश्यकता ही न पड़े।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
