*सद्गुरु*

       सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा

'गुरु' यानी वह दिव्य सत्ता, जो ईश्वर को हमारे भीतर दिखाने का सामर्थ्य रखते हैं और ब्रह्मज्ञान में दीक्षित करते समय घट भीतर ईश्वर का दर्शन करा देते हैं । वही सच्चा गुरु है।

लेकिन ज्ञान का आज के समय में क्या अर्थ लिया जाता है? ब्रेड विनिंग एजुकेशन (रोटी कमाने की विधा), किताबी ज्ञान, शास्त्रों का पठन -पाठन इत्यादि।

इसी तरह आज हम गुरु शब्द से क्या समझते हैं -'गुरु' वह जो कोई कला सिखा दे, कुछ चमत्कार कर दे, सांसारिक जीवन मे भाग्य  का पर्ची निकाल दे, नौकरी और धन  के बारे में चिकनी -चुपड़ी बातें करें या जो अच्छे वक्ता है या जो गेरुआ वस्त्र पहनते हैं। उसके पास आंतरिक ज्ञान है या नहीं? इस मूल विषय पर कोई ध्यान नहीं देता ।

*धारणात धर्म इत्याहु:*

अर्थात धर्म वह है जिसे धारण किया जाता है; ब्रह्म ज्ञान के माध्यम से अपने भीतर ईश्वर का साक्षात्कार करके!

आज के समय 'धर्म'शब्द 'संप्रदाय'तक सिमट कर रह गया है। उसे संप्रदाय के कुछ रीति-रिवाजों , कर्म-कांडो, उपासना - व्रत, आदि के नियमों को धर्म मान लिया है।

इस अज्ञानता से दोनों स्तरों पर हानि ही हानि है- स्वयं के आध्यात्मिक उत्थान की भी और साथ में सामाजिक समरसता की भी।

अतः आवश्यकता है कि इन शब्दों के जो गूढ़ अर्थ हैं , जो हमारे आर्ष  ग्रन्थों में लिखे गए हैं, हमें उन्हें सही तरह से समझना और अपने जीवन में धारण करना होगा। यह कार्य केवल समय के पूर्ण सद्गुरु की शरणागत होकर ही संभव है! वे इन शब्दों के अर्थ केवल शब्दों तक ही सीमित नहीं रखते। प्रयोगात्मक स्तर पर उन्हें अंतर्जगत  में प्रत्यक्ष अनुभूति के माध्यम से प्रमाणित भी कर देते हैं। 

ॐ श्री आशुतोषाय नमः 

श्री सियाबिहारी जी


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