सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
जब अपने वश में कुछ न रहे, मन अपने से ही दगा कर बैठे- तब एक ही उपाय रहता है- 'शरणागति।' शरणागति के ये भाव हर समस्या के समाधान हैं। ये हमें अपनी विवशता की जमीन से उठाकर असीम सामर्थ्य के आकाश तक ले जाते हैं। क्योंकि इन भावों के प्रत्युत्तर में हर युग में तारणहारों ने कहा है- तू केवल एक मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे तेरे सकल पापों से मुक्त कर दूंगा।
शरणागति का सूत्र लगते ही गुरु (या भगवान) माँ बन जाते हैं और शिष्य (या भक्त) शिशु बन जाता है।ऐसा शिशु जिसे अपनी गोद में उठाकर वह दिव्य सत्ता चलती है। कबीर दास कहते हैं- "राम मेरा सुमिरन करे मैं करूँ विश्राम"- यह है एक शरणागत शिष्य की परम अवस्था, जिसका यह अनुभव है कि साधना सुमिरन तक उसका साध्य ही उससे करा रहा है। यही नहीं, सांसारिक, सामाजिक, भौतिक और मानसिक- सभी चिंताओं से निजात पानी हो तो एक ही महौषधि है- शरणागति।
अब प्रश्न उठता है कि शरणागत किसके चरणों में होना चाहिए? उपनिषद ने एक तत्वज्ञानी आचार्य या पूर्ण गुरु को 'शरणागत वत्सल' कहा है और उनके दो गुण कहे गए हैं- 1) परत्वं- जिनके जोड़ का दूसरा कोई न हो। 2) सौलभ्यं- जो सर्वसुलभ हों। माने जो अद्वितीय भी हों और सबके लिए उपलब्ध भी हों। ब्रह्मज्ञान प्रदान कर तत्त्व का बोध कराने वाले गुरुदेव ही इन दोनों मापदंडों पर खरे उतरते हैं।उनके समान कोई दूसरा नहीं होता, क्योंकि ईश्वर के प्रकाश तत्त्व का साक्षात्कार केवल वे ही करा सकते हैं।
अब दूसरा प्रश्न है, शरणागति कैसी होनी चाहिए? शरणागति के दो उपाय हैं। एक है, 'साद्योपाय' औऱ दूसरा है, 'सिद्धोपाय'।
साद्योपाय वह उपाय है जो साध्य को पाने के लिए अपने प्रयत्नों से किया जाता है। इसलिए इस उपाय को 'स्वगत स्वीकारा' भी कहते हैं।उदाहरणस्वरूप बंदरी का बच्चा, जो स्वयं उछलकर अपनी माँ को पकड़ने का प्रयत्न करता है। इसमें चूक हो सकती है, हाथ छूट सकता है, पाँव फिसल सकते हैं।
सिद्धोपाय वह उपाय है, जो स्वयं गुरु या भगवान करते हैं हमें अपने से मिलाने के लिए। इसलिए इसे 'प्रगत स्वीकारा' भी कहते हैं, क्योंकि इस उपाय में हमें लक्ष्य तक पहुंचाने का उत्तरदायित्व हमारे साध्य पर होता है।उदाहरणस्वरूप बिल्ली का बच्चा, जिसे पकड़कर सुरक्षित स्थान पर ले जाने की जिम्मेदारी स्वयं बिल्ली की होती है। लेकिन कब? जब बच्चा पूर्ण रूप से आत्म समर्पण कर देता है।उसकी अपनी कोई स्वार्थ निहित 'मैं' नहीं रहती।मनीषियों ने इसी शरणागति को श्रेष्ठ माना है।
**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**
"श्री रमेश जी"
