सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
महा बुद्ध-- क्या आप अपने इन प्रश्नों के बस उत्तर ढूंढ़ रहे हैं या आपको इनके समाधान की तलाश है।
बड़ा गहरा प्रस्ताव था।अगर जिज्ञासु 'उत्तर' और 'समाधान' के बीच अंतर करना सीख जाए, तो समझो सारी भटकन खत्म हो जाती है। क्योंकि उत्तर शब्दों में मिलता है और शब्द कई तरह के जाल बुन सकते हैं। पर समाधान शब्दों से ऊपर सीधा आत्मा में उतरता है। आत्मा को इतना लीन कर देता है, जहाँ प्रश्न का अस्तित्व ही नहीं रहता।
बुद्ध का यह प्रस्ताव पाकर मौलिंगापुत्त बोले- मुझे इन प्रश्नों के उत्तर चाहिए।
महाबुद्ध-- क्या तुमने कभी किसी और से भी अपने प्रश्न पूछे हैं?
मौलिंगापुत्त-- जी... परंतु कोई भी उत्तर मुझे संतुष्ट नहीं कर पाया।
महाबुद्ध-- अगर उनमें मैं भी अपना एक उत्तर जोड़ दूँ- तो क्या आपको संतुष्टि मिल जाएगी?
मौलिंगापुत्त-- पता नहीं.. शायद नहीं।
महाबुद्ध-- क्योंकि आपके प्रश्न असल में जिज्ञासायें हैं और जिज्ञासाओं के उत्तर नहीं होते। जिज्ञासा का केवल समाधान होता है।
मौलिंगापुत्त-- तो दीजिए न समाधान।
महाबुद्ध-- अगर समाधान चाहिए, तो आपको कम से कम एक वर्ष के लिए मेरे साथ रहना होगा। भिक्षु संघ में रहकर साधना करनी होगी।
मौलिंगापुत्त संघ में ठहर गए। आत्मज्ञान में दीक्षित हुए। धीरे धीरे वे जिज्ञासु से साधक बन गए। मन की सीमाओं को पार कर आत्म प्रदेश के वासी बन गए।... और एक साल बीत गया।
उस दिन एक विशाल सभा लगी थी। सहस्त्रों भिक्षु बुद्ध का दर्शन रस पी रहे थे। इसी बीच बुद्ध ने मौलिंगापुत्त की ओर इशारा करके अपने पास बुलाया और कहा- तुम्हारे जो भी प्रश्न थे आज पूछ लो।तुम्हारे समस्त प्रश्नों का समाधान देने के लिए प्रस्तुत हूँ।
मौलिंगापुत्त-- हे तथागत, मैं तो प्रश्नों में उलझा एक प्रश्न चिन्ह था, जो बुद्ध के सान्निध्य में पूर्ण विराम बन चुका है। जिसने प्रश्न पूछने थे, उसे पहले ही समाधान मिल गया है।
भगवत प्रेमियों, उस एक वर्ष में ऐसा क्या हो गया कि मौलिंगापुत्त अपने प्रश्नों के साथ साथ अपना अस्तित्व भी भूल गए? वे अपने भीतर ऐसे लय हुए कि बाहर प्रलय आ गई। उन्होंने अपने बाहरी नेत्र बंद किए, भीतरी नेत्र से आत्म प्रकाश का अवलोकन किया।उनका बाहर खो गया। वे भीतर के हो गए।
हमें भी विचार करना है, हम कबतक बाहर बाहर रहेंगे? कबतक शब्दों और स्वरों की दुनिया में अपने उत्तर खोजेंगे। सोचिए क्या मात्र शब्दजाल में अपने प्रश्न एवं संशय का निवारण पा सकते हैं?
गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी अक्सर कहते हैं-- "भीतर से जुड़ो।... बाहर से तो केवल आश्वासन मिलता है।आशीर्वाद भीतर से जुड़ने पर मिलेगा। बाहर से पूछने पर केवल शाब्दिक उत्तर मिलेंगे। समाधान चाहते हो तो भीतर से पुकारो।... भीतर ही सबकुछ है।"
**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**
"श्री रमेश जी"
