**हमें मायावी संसार में रहते हुए ईश्वर से जुड़कर रहना चाहिए।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

आपने एक कहानी सुनी होगी, जिसका शीर्षक था-- "गोल्डीलाक और तीन भालू"। इस कहानी में गोल्डीलाक नामक एक लड़की जंगल में रास्ता भटक जाती है। वह वहाँ एक ऐसे घर में पहुंचती है, जिसमें माता भालू, पिता भालू, और बेबी भालू रहते थे। पर जब वह घर के अंदर गई, तो वे तीनों घर पर नहीं थे। गोल्डीलाक को बहुत जोर से भूख लगी थी। उसने देखा, रसोई में 3 कटोरियों में खिचड़ी रखी हुई है। उसने पहली कटोरी से खिचड़ी चखी, तो उसे वह बहुत ही गरम लगी और उसने उसे नहीं खाया। वह थी, पापा भालू की खिचड़ी। जब दूसरी कटोरी से खिचड़ी चखी, तो वह बहुत ही ठंडी थी। वह थी, माता भालू की खिचड़ी।उसने उसे भी खाना पसंद नहीं किया। फिर उसने तीसरी और आखरी कटोरी में से खिचड़ी चखी, जिसे वह पूरा खा गई क्योंकि वह खिचड़ी न ज्यादा गरम थी, न ज्यादा ठंडी।

   कहने का तात्पर्य, गोल्डीलाक नियम हमें जीवन कैसे जियें, इसका एक प्रैक्टिकल तरीका बताता है। हमारे संतों ने जीने के ऐसे संतुलित तरीके को अपनी भाषा में "कमलवत जीवन" का नाम दिया। लेकिन हम आज के युग के लोगों को देखें, तो पायेंगे कि वे दिन रात संसार की माया में ही रहना पसंद करते हैं। भोग पदार्थों के आधिक्य में शांति तलाशते हैं। वहीं दूसरी ओर एक ऐसा वर्ग है, जो यह मानता है कि संसार में शांति नहीं मिल सकती। उसे पाने के लिए तो संसार का त्याग कर वनों में घोर तपस्या करनी पड़ती है।

   परंतु ये दोनों ही वर्ग गलत हैं। इन्हें जानना होगा कि जीवन में शांति पाने के लिए भी गोल्डीलाक नियम लगाने की आवश्यकता है।माने एक संतुलित जीवन जीने की, जैसा कि कमल जीता है। वह कीचड़ में रहकर भी सूर्य की ओर मुख कर अपना जीवन आनंदमय बनाता है।

    ठीक ऐसे ही, हमें भी मायावी संसार के पंक में रहते हुए ईश्वर से नाता जोड़ने की कला सीखनी होगी। अर्थात न पूरी तरह संसार में लिप्त होना है, न पूरी तरह संसार का त्याग करना है। यह कला एक सद्गुरु ही प्रदान कर सकते हैं। वे हमें ब्रह्मज्ञान में दीक्षित करते हैं, जिसके द्वारा एक व्यक्ति संसार में रहकर भी परमात्मा से जुड़ा रहता है।

**ओम् श्री आशुतोषाय नमः **

"श्री रमेश जी"

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